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शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

मौत का लाभप्रद कारोबार


मेरा शहर आजकल शूटिंगरेंज बना हुआ है ,जहाँ जांबाज़ शूटर आते हैं और किसी भी जीवित आदमी पर अपनी निशानेबाजी को आजमाते हैं और जिस रास्ते से इच्छा होती है मज़े से  टहलते हुए निकल जाते हैं|एक पंथ दो काज ,निशानेबाजी का अभ्यास भी हो जाता है और सेहत के लिए मुफीद मॉर्निंगवाक भी |मानना होगा कि मेरा शहर धनार्जन के लिए हत्याकर्म करने वालों के लिए एक अभयारण्य बन गया है |मौत के कारोबार में  इतनी अधिक प्रतिभाओं का प्रादुर्भाव रोमांचित करता है |जहाँ देखो मौत का धूमधडाका है|रक्तरंजित सड़कें है ,चीखपुकार है ,थ्रिल है ,सुनने सुनाने के लिए दुस्साहस भरे किस्से हैं |पूर्ण सत्य पर आधारित मौत से साक्षात्कार का लाइव टेलिकास्ट है |मारधाड से भरपूर ये दृश्यावली हालीवुड के फिल्म निर्देशकों तक को शर्मिन्दा कर सकती है |बालीवुड इनसे प्रेरणा हांसिल कर सकता है |ऐसा रचनात्मक समय है यह कि मसाला फिल्मों के लिए अकूत  कच्चा माल उपलब्ध है|ऐसी नायाब परिस्थितियों के मध्य भी यदि कोई ब्लाकबस्टर या बेस्टसेलर रचने से चूकता है  तो ये उसकी दुर्भाग्य, अदूरदर्शिता या फिर कर्महीनता  ही माना जायेगा |सकल पदारथ है जग माहीं,कर्महीन नर पावत नाहीं|
                एक बात एकदम स्पष्ट है कि कोई मेरे इस शहर पर कर्महीनता का लांछन तो कम से कम अब नहीं लगा सकता|मृत आत्माओं को छोड़ कर सभी इस आरोप के दायरे से बाहर हैं|हत्यारे अपना कर्म बखूबी कर रहे हैं |पुलिस सबूत एकत्र करने के काम से लेकर निर्जीव शरीर के पंचनामा करने तक का काम पूर्ण तन्मयता से कर रही है |पोस्टमार्टम पूरी प्रोफेशनल निपुणता के साथ हो रहे हैं |मृतक के सभी इष्टमित्र ,सगे सम्बन्धी ,सहयोगी विलाप करने का काम बखूबी कर रहे हैं |तमाम सामाजिक संघटन शासन प्रशासन को कोसने के काम में अपनी अपनी मुखर अभिव्यक्ति  का सर्वोत्तम प्रदर्शन कर रहे हैं |एक से बढ़ कर एक शोक सन्देश लिखे और लिखवाये जा रहे हैं |खबरनवीस ओवर टाइम कर रहे हैं |उनके सामने खुद को साबित करने की विकट चुनौती है पत्रकारिता में अपना कैरीयर चमकाने का ऐसा दुर्लभ अवसर बड़ी कठनाई से उपलब्ध हुआ करता है |अपराध की दुनिया में गहरी पैठ रखने वाले टिप्पड़ीकारों , सिद्धांतकारों और मुखबिरों के बाज़ार भाव में  अनायास ही उछाला आ गया है |
                मेरे शहर में जिसे देखो वही शूटरों का रण कौशल देख कर मुग्ध है |वे किस खूबी से दबे पाँव आते है अपने काम को अंजाम देते हैं और बेदाग निकल जाते हैं |उनकी  निपुणता घात लगा कर चूहे को दबोचने वाली चालाक बिल्ली ,उड़ते हुए पतंगे को उदरस्थ करने के लिए प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से अपने जीभ लपलपाने वाले गिरगिट और विधुत गति से हमला करके शिकार को संभलने तक का अवसर न देने वाले तेंदुए तक के आखेट करने के कौशल पर प्रश्नचिन्ह लगानेवाली है |एक बात तय है कि मौत परोसने के इस कारोबार में जोखिम न्यूनतम और ग्लेमर भरपूर है |इस क्षेत्र में एकबार नाम हो गया और आपने खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित कर लिया तब तो रियलस्टेट ,के मुनाफे से भरे व्यवसाय में बिना किसी श्रम,बौद्धिक चातुर्य और पूँजी निवेश के आपकी हिस्सेदारी का होना निश्चित है |रंगदारी के धंधे से जो नियमित आमदनी होगी वो अलग |हो सकता है कि आप अपने खौफ ,रसूख और सम्पन्नता के प्रदर्शन के चलते राजनीति के आकाश का ऐसा चमकता सितारा बन जाएँ ,जिसकी चमक में सारे राजनीतिक अवधारणाएँ ही निरस्त हो जाती हैं   |संभावनाएं अनंत हैं |कर्मवीर नरों का वरण तो कामयाबी स्वत: ही करती है |
                  मृतकों की आत्मा के प्रति मेरे मन में गहरी सहानभुति है |उनकी शोकसभाओं में जाकर आंसू बहाने का जब भी मौका मिलता है ,मैं ज़रूर जाता हूँ|मौखिक संवेदनाओं के  मेरे भीतर अथाह धनसंपदा से भरे पद्मनाभ मंदिर सरीखे अनेक ज्ञात अज्ञात तहखाने हैं ,इनमें से चाहे जितना उलीचूं ,ये कभी रीतने वाले  नहीं| मैं तो संत कबीर का हामी हूँ –न काहू  से दोस्ती ,न काहू से बैर |मैं ठहरा तटस्थ दृष्टा ,शोकाकुल लोगों के साथ खड़ा हुआ  तो उनके कांधे पर सिर रख कर रो लिया  ,कर्मवीर शूटर दिखा तो उसके बाहुबल की शान में काढ दिए  कसीदे |मेरे शहर में सुरक्षित बने रहने के एकमात्र उपाय भी तो यही है |


मंगलवार, 20 सितंबर 2011

लंबे का सबक



लंबा दुकानदार  एक सप्ताह के प्रवास के बाद मुम्बई से आज ही लौटा था .वह बहुत उत्साहित था .कसबे के बाज़ार में उसकी नकली जेवरात किराये पर देने वाली इकलौती दुकान थी.विवाह के अवसर पर दुल्हन के पहनने लायक जेवर वह मुहँ मांगे दाम पर किराये पर देकर अच्छा मुनाफा कमाता था.मुम्बई जाकर वह लेटेस्ट डिजाइन की ज्वेलरी लाता था.
वह जब भी मुम्बई जाता तो वहाँ से लौटकर उसे लगता कि अपने बाज़ार के अन्य दुकानदारों के बीच उसका कद कुछ और बढ़ गया है यह सच था कि उस बाज़ार के अधिकांश दुकानदार औसत से छोटे कद के थे.वह उन्हें निहायत निरीह समझता था ,जिन पर  केवल दया की जा सकती थी या प्रवचन दिया जा सकता था .
लंबा दुकानदार इस बार मुम्बई से एक ऐसी बात जानकर आया था ,जिसे वह उन बौने दयनीय दुकानदारों को बता देने को आतुर था .मौका मिलते ही उसने अपना प्रवचन शुरू किया --आमची  मुम्बई तो एकदम झकास है .झकास बोले तो .....उसने वाक्य अधूरा छोड़ कर बौनों की ओर सवाल उछाला .सारे बौने लंबे का मुहँ ताकने लगे.उनकी ये हालत देख कर वह और उत्साह से भर उठा. उसने पास की हलवाई की दुकान से आ रही इमारती तलने से उठ रही दिव्य गंध को अपने भीतर  स्थापित करने के लिए लंबी सांस भरी.फिर बोला -मुम्बई में सब अपने काम से काम रखते हैं .कोई व्यापरी किसी  की फटी में कभी टांग नहीं अडाता.इसीलिए वो इतने कामयाब हैं .एक तुम लोग हो ....
लंबे ने फिर वाक्य अधूरा छोड़ दिया .बौनों में कोतुहल बढ़ गया .
लंबा उन मूर्ख बौनों के इस कौतुहल का कुछ देर मज़ा लेने के बाद बोला ,मैं वहाँ सड़क के किनारे एक दुकान पर बैठा था .तभी दो कारें  आपस में टकरा गईं.मुम्बई के दुकानदार ने तुरंत घोषणा कर दी ,देखना अब वो कार  वाला अपनी कार से बाहर आयेगा जिसकी कार की हेडलाइट टूट कर लटक गई है .और ऐसा ही हुआ.उस दुकानदार ने फिर भविष्यवाणी की ,अब टूटी हेडलाइट  गाली देता हुआ दूसरी कार की ओर बढ़ेगा .उसकी बात एकदम सही थी.ऐसा ही हुआ .दुकानदार ने आँखों देखा हाल जारी रखा ,जिसमे एक और भविष्यवाणी थी ,दूसरी कारवाला अपनी कार का शीशा बंद ही रखेगा और कार के भीतर बज रहे संगीत का लुत्फ़ लेता रहेगा ,जैसे कुछ न हुआ हो.अक्षरशः सत्य साबित हुई उसकी यह बात .
दुकानदार ने बात आगे बढ़ायी -अब देखना ये अपनी भड़ास निकलने और  मदद की उम्मीद में हमारी दुकान की ओर आयेगा और मैं ...उसकी बात अधूरी रह गई .टूटी हेडलाइट दुकान के पास आकर जोर जोर से अपनी व्यथा कहने लगा.दुकानदार  तुरंत अपने दोनों हाथों से पंखा झलने लगा .टूटी हेडलाइट निराश हो कर अपनी कार में जा बैठा और उसे स्टार्ट कर आगे बढ़ लिया .लंबा सारी कथा सुनकर मौन हुआ तो बौने उससे प्राप्त इस ज्ञान के प्रति आभार से भर उठे.
उसी दिन शाम को लंबे की दुकान पर कुछ ग्राहक आये .उनसे किसी बात पर उसकी गरमा गर्मी हो गई .बात हाथापाई तक पहुँच गई .ग्राहक चार थे और हष्टपुष्ट भी .लंबा पिटने लगा .उसने मदद के लिए बौनों को पुकारा .उसने देखा कि सारे बौने अपने दोनों हाथों से पंखा झलते मज़े से तमाशा देख रहे हैं .

शनिवार, 17 सितंबर 2011

मैं और मेरा शहर


मुझे नहीं पता कि मेरे शहर में कुल कितने लोग हैं जो अमरीका की पॉप गायिका स्टीफनी जोआन एन्जलिना जेर्मोंतो को जानते हैं   |इटेलियन मूल की इस पॉप गायिका को  इस नाम से तो कोई कहीं भी नहीं जानता |अलबत्ता  लेडी गागा के   नाम  से विख्यात  इस पॉप सनसनी के  मुरीदों की फेहरिस्त में इस अकिंचन का नाम भी जुड़ गया है | न्यूयार्क में हुए आतंकवादी हमले की  दसवीं बरसी पर लेडी गागा का यह बयान आया -मुझे न्यूयार्क से प्यार है |उससे से मेरा संबध उस पति जैसा है ,जिससे मेरा विवाह नहीं हुआ|
            लेडी गागा के इस वक्तव्य से दो बातें एकदम साफ़ हो गईं कि अमरीका में अभी तक पति नाम के प्राणी और प्यार के बीच एक गहरा रिश्ता बरक़रार है और दूसरा यह कि वहाँ बिना विवाह हुए भी पति हुआ करते हैं|मेरे शहर में तो पति प्रतारणा ,धिक्कार ,सार्वजानिक स्थानों पर पिटने योग्य ,गरियाये जाने लायक हुआ करते  हैं|उनसे प्यार का भला क्या लेना -देना ?परिवार परामर्श केन्द्रों से  जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है ,उससे तो यही पता लगता है |मैं उस पति के सम्बन्ध में कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ जो बिना ब्याह रचाए ही पति का  ओहदा  हथियाने की हिमाकत करते हैं |ऐसे तथाकथित  पतियों के  प्रति तो मैं केवल सहानाभूति ही प्रकट कर सकता हूँ| मेरे शहर में जितनी बेकद्री इस पति नाम के प्राणी की है ,उतनी किसी अन्य जीव जंतु की नहीं |वे तो ताडन के शाश्वत अधिकारी माने गए हैं|मुझे उम्मीद है कि लेडी गागा ने जब न्यूयार्क से अपने लगाव के सम्बन्ध में अपनी भावनाएं व्यक्त की होंगी तब उनके मन में यकीनन कोई दुर्भावना या कटाक्ष का भाव नहीं रही होगा|कला से जुड़े लोगों में अभी इतनी संवेदनशीलता है कि ग़मगीन पलों में हँसने हंसाने से परहेज़ करें|
            मुझसे आज तक कभी किसी ने नहीं  पूछा कि मैं अपने शहर के बारे में क्या भावना रखता हूँ |लेकिन यदि किसी ने मुझसे पूछा तो मैं कहना चाहूँगा कि इस शहर से मेरा रिश्ता बड़ा उलझन भरा रहा है|इस रिश्ते का खुलासा करने में वे तमाम खतरे मौजूद हैं जो सच बोलने पर सुकरात के समय में थे|समय चाहे कितना बदल गया हो साफगोई के साथ जुड़े गंभीर खतरों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता|वैसे  अब कौन किसको जहर का प्याला पिलाने की ज़हमत उठाता है |मरने -मारने के लिए अनेक बेहतरीन साधन उपलब्ध हैं |जिसकी जैसी औकात ,उसको वैसी मौत|
            मैंने पहले ही अर्ज किया कि अभी ऐसी कोई ज़रूरत पेश नहीं आयी है कि मैं अपने शहर के संबध में अपनी राय का खुलासा करने के लिए विवश हूँ |फ़िलहाल यदि मैं झूठ और सच का घालमेल करके काकटेल परोस दूं तो मुझे विश्वास है  कि चीयर्स -चीयर्स की कुछ मद्धम आवाजें अवश्य सुनाई देंगी|आज़ादी के बाद हमने फरेब को सच मानकर हथेलियाँ पीटने का काम तो  बखूबी |सीख ही लिया है |
            यदि मुझे अपनी बात बिना किसी लागलपेट के कहनी हो तो मैं कहना चाहूँगा कि अपने शहर से मैं प्यार भी करता हूँ और गहरी नफरत भी|मेरा इस शहर से नाता उस बीमार औरत जैसा है जो अपने पति से रात दिन लड़ती है ,गली गलौच करती है ,हाथापाई पर अमादा हो जाती है ,पर उसके सिराहने से उठ कर जाने भर के संकेत भर से सिहर कर उससे लिपट जाया करती है|मेरा इस शहर से सम्बन्ध अमीरों की किसी बस्ती के बीच बनी उस झोपड़पट्टी जैसा है ,जिससे शरीफजादे चाहे जितनी नफरत करें पर जिसकी उपस्थिति उनके लिए  सस्ते कामगार और घर में काम करने वाली बाईयों उपलब्ध कराने की खूबी के चलते अपरिहार्य होती  है |मेरा इस शहर से ताल्लुक  ज्योतिषी के उस तोते सरीखा है जो सबका भविष्यबांचने का दिन रात नाटक करते करते इतना बेबस हो चुका  है कि पिंजरा खुला  रह जाने के बावजूद भी खुले आकाश में परवाज़ नहीं भरता क्योंकि वह उड़ने की कला और ख्वाहिश ही खो चुका है | मेरा शहर गरीब ,मजलूमों, मेहनतकशों के प्रति चाहे जितना असंवेदनशील हो लेकिन वह किसीको अन्ततः पनाह देने में कभी गुरेज़ भी नहीं  करता |इस शहर की फिजाओं  में गुलाब के फूलों की खुशबू भी है और  आत्मा तक को लहूलुहान कर देने वाले बेमुरव्वत तीखे कांटे भी|
            लेडी गागा ने किस सहजता से अपने शहर के प्रति अपनी मौहब्बत का इज़हार कर दिया पर जब मैंने इस काम को करना चाहा तो मेरे मन के अँधेरे कोनों में रखे मेरे शहर के  इतिहास के वे   रक्तरंजित पन्ने फडफडा उठे ,जिन पर मेरे अपने और  पूर्वजों  के स्याह कारनामे दर्ज हैं|लेकिन मैं केवल उन्हीं पन्नों का बखान फ़िलहाल  करूँगा ,जो आने वाले वक्त के लिए रौशन मशाल बन कर हमें सही रास्ता बताने का काम करें|याद रहे मैंने इतिहास के कुछ पन्नों को मोड़ कर छोड़ दिया है ताकि वक्त ज़रूरत उन्हें पेश करने में मुश्किल न हो |इसे आप मेरी कायरता या चतुराई याफिर आत्मरक्षा के लिए संभाल कर रखा गया हथियार , जो चाहे, मान सकते हैं |

निर्मल गुप्त

चीरहरण का खेल


सोमवार, 12 सितंबर 2011

ननुआ का जन्म दिन(haribhoomi के १३ सितम्बर २०११ के अंक में प्रकाशित )

गुपचुप खेल जारी है (लघुकथा)


अन्ना हजारे का आन्दोलन चल रहा था.दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना अनशन पर थे .सारा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके साथ आ खड़ा हुआ था.छोटे बच्चे कालोनी की गलियों में ,एक दो तीन चार -बंद करो यह भ्रष्टाचार का नारा लगाते घूम रहे थे.सबको लग रहा था कि अब तो भ्रष्टाचार का समूल नाश हो ही जायेगा.मालती को भी यकीन हो चला था कि अब उसके पति के रोज जेब भर -भर नोट भर कर लाने वाले दिन हवा हुए.अब तो उसकी जायज़ आमदनी में ही गृहस्थी चलानी होगी.फिर भी वह रोमांचित थी,उसका कामकाज से बचा हुआ समय टी वी पर आन्दोलन के लाइव टेलीकास्ट को देखते हुए बीतता.अन्ना को मंच से हुंकार भरते देख उसकी आँखे नम हो जाती थीं.
मालती का पति परिवहन विभाग में क्लर्क था.उसकी वेतन के अलावा रिश्वत की खूब मोटी कमाई थी.इसीलिए वह खुद शाही अंदाज़ में रहता था .बच्चों को ऐश कराता था .घर में उसने सारी सुख सुविधाओं का मुकम्मल इंतजाम कर रखा था.कमी तो मालती को भी कोई न थी.
आन्दोलन चलता जा रहा था .सरकार अन्ना की लोकपाल की मांग मानने को तैयार न थी .अन्ना भी अनशन पर अडिग थे.मालती के मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.दिन ढले पति घर आता.वह एकदम बेफिक्र दिखता था.उसके दोनों बच्चे , बेटा जो ग्रेजुएशन की पढाई कर रहा था और इंटीरियर डेकोरेशन में डिप्लोमा कर रही बेटी ,भी एकदम बेपरवाह दिखते थे.
वह शुक्रवार का दिन था.वे सब रात को  साथ बैठे खाना खा रहे थे.बिना एकदूसरे से कुछ बोले ,चुपचाप.तभी बेटे ने चुप्पी तोड़ी.वस्तुतः उसने एक जुमला हवा में उछाला ,जो अंग्रेजी में था ,जिसका मतलब जो मालती समझ पाई वह यह था -देश  इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर है .क्या हम ऐसे ही बैठे रहेंगे ,हाथ पर हाथ धरे.उसकी बात सुन सभी चोंके.मालती ने अपने पति के मुहँ की ओर देखा.हमेशा की तरह वहाँ परम शांति का भाव पसरा था .थोड़ी देर वहाँ सन्नाटा पसरा रहा.बच्चों के पिता ने नपेतुले शब्दों में कहा -नहीं, हम यूं तमाशबीन बने नहीं रह सकते.क़ल सुबह हम सब रामलीला मैदान जायेंगे और अन्ना की आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ को मिलायेंगे.
मालती हैरत में थी.उसके पति के भीतर भी एक क्रन्तिकारी का दिल धड़कता है ,ये तो उसे अब तक मालूम ही नहीं था.वे तो उसे निरा दुनियादार किस्म का आदमी समझती आयी थी.तब बच्चे यदि वहाँ नहीं रहे होते तो वह अपने पति का मुहँ चूम लेती.
सुबह हुई .मालती उसका पति ,दोनों बच्चे रामलीला मैदान जाने को जल्दी -जल्दी तैयार हो गए.उन्होंने पीने के लिए पानी कुछ सेंडविच,चिप्स आदि भी साथ रख लिए.बेटी ने कुछ प्लेकार्ड भी रातों -रात तैयार किये थे वे भी ले लिए.सब गाड़ी में सवार हो कर चल दिए .
रामलीला मैदान में खूब रौनक थी.कौमी तराने वातावरण में गूँज रहे थे.मंच पर बड़े -बड़े सेलिब्रिटी आकर अन्ना के समर्थन में बयान दे रहे थे .टी वी वाले चारों ओर अपना कैमरे दौड़ा रहे थे.कैमरा जैसे ही उनकी ओर आता लगता तो बेटा और बेटी प्लेकार्ड को हवा लहरा कर नारे बुलंद करते.
मालती के लिए तो ये एकदम नया अनुभव था.वह एक बनते हुए इतिहास में अपनी हिस्सेदारी को देख रही थी.
धीरे -धीरे रात घिरने लगी .सभी घर वापस जाने लगे .बेटा और बेटी दिन भर की धमाचौकड़ी से थक गए थे .गाड़ी की पिछली सीट पर बैठते ही सो गए .बगल की सीट गाड़ी ड्राइव करते पति का उसने देखा तो उसपर वही परम संतोष का स्थाई भाव था.
मालती के मन में अनेक सवाल उथलपुथल मचाए थे.उसने बच्चों को सोता जानकार पूछ लिया -सुनोजी ,अब तो आपकी ऊपरी आमदनी बंद हो जायेगी?यह सुनते ही मानो भूचाल आ गया.हँसते हँसते पहले उसके पति का सीना हिला फिर तोंद थरथरा उठी.इसके बाद तो हंसी से उसका गला रुंध गया और आँखों से पानी गिरने लगा.उसने तुरंत गाड़ी को किनारे कर उसे रोक दिया.वह सोच रही थी कि आखिर उसने ऐसा क्या कह दिया जो .....तभी पिछली सीट से उसे बेटे की आवाज़ सुनाई दी -मॉम डोंट बी सिली.डैड तो अन्ना के प्रशंसक हैं और गाँधी बाबा के भी भक्त.
बेटी ने भी बात को आगे बढ़ाया -यू नो गाँधी बाबा ,वो जो हरे नीले लाल कागज पर छपे होते हैं.
इसके बाद जो उनका सामूहिक ठहाका गूंजा तो मालती के कानों ने उस ध्वनि को सुनने से इंकार कर दिया.मालती को लगा युग बीते ,पात्रों के नाम बदल गए ,पर स्वार्थ  की चौपड़ पर विश्वास के चीरहरण का गुपचुप खेल तो  अभी भी सत्ता के दरबार से लेकर  घर -घर में चल रहा है.
निर्मल गुप्त


रविवार, 11 सितंबर 2011

ननुआ का जन्म दिन


जनगणना का काम जोर शोर से चल रहा था|गांव में भी इस काम में लगे कर्मचारी आये हुए थे|उनके पास काले रंग के झोले थे,जिनमें उनके पास वे तमाम प्रपत्र थे ,जिस पर गांव के निवासियों के बारे में उनके  मकान ,दुकान, खेत- खलिहान ,बच्चों की संख्या ,उम्र ,जाति ,शिक्षा ,आर्थिक हालात के बारे में एक -एक  सूचना दर्ज की जानी थी|कर्मचारियों के साथ ग्राम प्रधान भी था |वह सब ग्रामवासियों को बताता चल रहा था कि जनगणना के काम में सबका सहयोग ज़रूरी है,इससे जो आंकड़े एकत्र होंगे उनसे सरकार गांवों के हित के लिए योजना बनाएगी|
पूरे गांव में हलचल थी |सभी लोग इस काम में सहयोग को तत्पर थे|किसानों ने खेत पर काम पर जाने का काम टाल दिया था|मजूरी करने वाले भी काम पर लगने से रुक गए थे |पाठशाला के मास्टरजी भी जनगणना में लगा दिए गए थे ,इसलिए बच्चों को स्कूल जाने से मुक्ति मिली हुई थी ,वे गांव की गलियों में धमाचौकड़ी मचा रहे थे|
घनश्याम को सुबह ही पता चल गया था कि जनगणना वाले आने वाले हैं पर वह अपनी घरवाली के मना करने पर भी रुका नहीं था और पास के कसबे की ओर काम पाने की आस में निकल गया था |उसमें जनगणना के महत्व को लेकर कोई उत्सुकता नहीं थी|वह जानता था कि दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए काम पर जाना कितना ज़रूरी है|वह घर पर रह कर उन अटपटे सवालों का जवाब देने से बचना चाहता था जो उससे अक्सर पूछे जाते हैं पर जिनका समाधान किसी के पास नहीं हैं |
घनश्याम की पत्नी घर की झाड- बुहार करती बेचैन थी कि जाने ये लोग उससे क्या -क्या पूछेंगे |वह तो अनपढ़ गंवार है ,क्या बता पायेगी |कहीं सब उसकी खिल्ली न उडाये|और फिर वह इन लोगों को कहाँ बैठने को कहेगी ,उसके पास तो एक ढंग की चारपाई भी नहीं|वह अभी सोच में ही पड़ी थी कि जनगणना वाले आ धमके उसके द्वार |बाहर से प्रधान ने हांक लगाई तो वह लंबा घूँघट खींच कर बाहर आयी|
अरे खीसू घर पर न है |उसे बुला |प्रधान ने कहा |
वे तो काम पर जा रहे |उसने सहमते हुए कहा |
उसे न पता था कि आज गांव की जनगणना होनी है |बड़ा कमेरा बनता है |यह प्रधान की हिकारत भरी आवाज़ थी|
वह चुप खड़ी रही ,नजरें नीची किये |
चलो कोई बात नहीं ,तू ही बता जो हम पूछते हैं |जनगणना वाला काम निबटाने की जल्दी में था |
वे एक -एक कर तरह तरह के सवाल पूछते रहे |वह यथाशक्ति जवाब देती गई |पर बात तब अटकी जब उन्होंने उसके छोटे बेटे की उम्र पूछी |वह इस सवाल के जवाब में खामोश रही |तब प्रधान ने डपटा-तुझे ये न पता कि कब जना था तूने उसे |
आखिरकार उसे जवाब देना पड़ा |वह बोली तो सबको लगा उसकी आवाज़ किसी गहरे कुआं से आ रही है |उसने बताया -प्रधानजी खूब याद है कि कब जन्मा था मेरा ननुआ |उस दिन काली बदरी छाई थी |खूब बरसे थे मेघ |ननुआ के बापू काम पर गए थे कारखाने में काम करने|
पर यह तो बता कि तेरा  ननुआ है कितने बरस का|तुझे कुछ याद न क्या ?जनगणना वाला बेचैन हो चला था |
याद क्यों न होगा बाबूजी |उस दिन ननुआ के बापू के सीधे हाथ की चारों उँगलियाँ मशीन में फँस कर कट गई थी ,उस दिन जन्मा था यह अभागा|
यह सुनते ही सन्नाटा छा गया|थोडा रुक कर उसने कहना जारी रखा -कारखाने वाले ने इन्हें इसके बाद काम से निकाल दिया|जिसका सीधा हाथ ही पूरा न हो ,उसे भला कौन काम देगा |तबसे कसबे में जाकर छोटी मोटी मजूरी कर आते हैं |आधे हाथ वाले को आधी मजदूरी पर भी कोई काम पर कभी -कभी ही रखता है|ननुआ के जन्म के बाद हमने कुल  कितनी रात भूखे पेट  और कितनी अधपेट खाकर  बिताई ,ये तो हमें याद नहीं|इसे याद रख कर होगा भी क्या?
फिर किसी ने  कुछ न पूछा और वे आगे बढ़ गए |
निर्मल गुप्त