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गुरुवार, 29 मार्च 2012

ये पत्र बड़े जादुई हैं



                         एक समय वो भी था जब पत्र बड़ा कमाल करते थे |इनके जरिये एक दिल से दूसरे दिल तक प्यार की पींग पहुँच जाती थी |तब न एसएमएस था न एमएमएस ,न मोबाईल फोन ,न  इंटरनेट   और न हीं  फेसबुक |फेस टू फेस प्यार का  इज़हार संभव ही नहीं था  |लड़कियों के अभिभावक हाथ में मज़बूत डंडा और जेब में राखी लेकर चलते किसी साये की तरह उनकी निगरानी करते थे |जरा सी चूक हुई नहीं कि डंडे से पृष्ठ पूजा होती  और कलाई में लड़की के हाथों राखी बंधवा कर सद्य प्रेम का पटाक्षेप |बस एक पत्र ही थे जो अपेक्षाकृत सरल, सुलभ और कम जोखिम वाला वह उपकरण थे , जिसके माध्यम से प्रेम गीत कभी –कभी हकीकत में तब्दील हो जाते थे |उन दिनों  कुछ अतिमेधावी प्रेमी प्रेम गीत लिखने का अभ्यास करते रह गए और उनकी प्रेरणा को कोई और ले उड़ा|अभी भी अनेक घरों के पुराने संदूकों में बड़ी हिफाजत से रखे गए ऐसे प्रेम गीतों का जखीरा मिल जाया करता है ,जिन्हें पढ़ कर   लोगों की आँखे छलछला आती हैं| |
                   ये उस वक्त की बात है जब प्यार सिर्फ प्यार था |दो दिलों के धडकनों के बीच बहती पारदर्शी जल से भरी खामोश नदी का पर्याय |तब तक किसी को  प्यार के व्यापारिक मूल्य का कुछ अता पता नहीं था |धीमी रफ़्तार से चलती जिंदगी में भावनाओं की ये  खतोकिताबत रोमांचित भी करती थी और दैहिक प्यार को शब्दिक अभिव्यक्ति भी देती थी  |उस समय शायद ही कोई ऐसा रहा होगा जिसने जवानी की दहलीज़ तक पहुँचते न पहुँचते इसे महसूस न किया हो |हालंकि उस समय में भी हमारे समाज में नैतिकता के स्वयम्भू पहरूओं की कतई कमी नहीं थी जो प्यार की गंध पाते ही आदमखोर हो जाते थे |मेरे मोहल्ले की गली नम्बर पांच में रहने वाले एक युवक की  गली नम्बर दो में रहने वाली लड़की से आँखे चार हुईं तो युवक ने अपने प्रणय निवेदन को कागज पर दर्ज़ करके उसे एक ढेले पर लपेट कर लड़की की ओर आकाश मार्ग से उछाल दिया |गली नम्बर तीन में रहने वाले एक इर्ष्यालू ने उसे लपकने की पुरजोर कोशिश की पर नाकामयाब रहा पर गली नम्बर चार में रहने दिलफुंके आशिक ने कोई चूक नहीं की |फिर हुआ ये कि उस पेम पत्र के लीक होते ही ऐसी किचकिच मची कि पूरे मोहल्ले में महीनों तक युवापीढ़ी के चारित्रिक पतन पर मौखिक  निबंध लिखे जाते रहे |
                    पर अब समय बदल चुका है |अब न वो प्यार रहा न वो प्रेमी और न खत लिखने -पढ़ने वाले वैसे शूरवीर |अब तो पत्र कभी कभार ही लिखे जाते हैं |जब लिखे जाते हैं तो अक्सर वो लीक हो जाते हैं |सरकारी दरोदीवारों में आँख कान और नाक उग आये है | स्वचालित हथियारों से लैस पहरेदारों की सुरक्षा में रखे पत्र फरार होकर लेटर बम बन जाते हैं ,जिनके धमाके सरकारी ओहदेदारों को बेचैन कर देते हैं  और मीडिया को दे देते हैं जश्न मनाने का मौका |अब सरकरी तंत्र की गोपनीयता में इतने सुराख़ हैं जिनमें रखा कुछ भी बिखरने से कुछ  नहीं बचता चाहे वो कैग की रिपोर्ट हो , राजकोष ,अतिसंवेदनशील सामरिक महत्व की जानकारी या फिर सेना प्रमुख द्वारा  प्रधानमंत्री को लिखा पत्र |
                  समय चाहे कितना बदल गया हो पर पत्र तो अब भी बड़े जादुई  हैं |बिना किसी आरडीएक्स,बारूद या ईंधन के धमाके पर धमाके किये चले जा रहे हैं |
  


सोमवार, 19 दिसंबर 2011

साहित्यिक अवदान की दुखद गाथा



                     मेरे शहर में किस्से बहुत हैं |यहाँ के चप्पे -चप्पे पर अनेक कहानियों  की इबारत  दर्ज हैं पर इन कहनियों को सलीके से दर्ज कर सकने वाले कहानीकारों का नितांत अभाव है |यह भी ताज्जुब की बात है कि मौखिक परम्परा की किस्सागोई की कला यहाँ खूब फल -फूल रही है |आपको यहाँ की हर गली मोहल्ले में एकाधिक ऐसे किस्सागो ज़रूर मिल जायेंगे ,जिनके पास सुनाने लायक किस्सों का भंडार हमेशा रहता है |ऐसे किस्सागोओं के पास उत्सुक श्रोताओं की कभी कोई कमी नहीं रहती |हालाँकि लेखकों के सामने पाठकों की कमी का बहाना हमेशा रहता है | ऐसे यशस्वी लेखकों का पसंदीदा जुमला है -लिख कर क्या करें ,आजकल कहानी -किस्से पढ़ता कौन है | मेरा मानना है कि इन सुनामधन्य लेखकों पर यह पुरानी कहावत चरितार्थ होती है ,नाच न जानें आँगन टेढ़ा|हो सकता है कि इस शहर का आँगन वास्तव में टेढ़ा हो |इस सबके बावजूद शहर में  इतनी  सारी कविताजीवी संस्थाओं और कवियों की उपस्थिति तो यही इंगित करती है कि आँगन की वास्तु का कवि मन पर कोई असर नहीं पड़ता |हालात चाहे हों ,जिनको रचना है काव्यमय संसार अपने लिए वो अपने काम में पूरे मनोयोग से लगे हैं |यह अलग बात है कि उनकी कविताओं और गीतों  में  वर्तमान अपनी उपस्थिति इतनी ही दर्ज करवा पाया है ,जितनी जगह अख़बारों में चमत्कारिक बाबा ,तिलस्मी अंगूठी के ज़रिये भविष्य सुधार की हुंकार भरने वाले कारोबारी ,सेक्स सम्बन्धी दुर्बलता का पलक झपकते निदान करने वाले स्वयंभू डाक्टर और एक से बढ़कर एक वैवाहिक रिश्ते उपलब्ध कराने वाली दुकानों के मालिक वर्गीकृत विज्ञापनों को छपवा कर पाते हैं |इनकी काव्य रचनाओं में रीतिकालीन नायक, नायिकाएँ ,उनकी भावभंगिमा ,रानिवासों में लगातार चलते षडयंत्र और भांडों चाटुकारों और मसखरों का आख्यान इस तरह उपस्थित रहता है ,जैसे रीतिकालीन समय के बाद कालचक्र का पहियां थम गया हो| श्रमजीवी कामगार ,मजदूर, किसान और  समाज के अंतिम पायदान पर ठगा -सा खड़ा दलित शोषित इनके एजेंडे भी है ही नहीं |बाल लाल गाल के मोहपाश में उलझे ये प्रतिभावान कवि और गीतकार अपने -अपने स्वप्निल संसार में बिना किसी अपराधबोध के  जी और मर रहे हैं|
                      यह सवाल अनुत्तरित है कि मेरे शहर में अकूत रचनाधर्मिता की संभावनाओं के बावजूद कहानीकारों  का पैदा होना क्यों बंद हो गये  ? राष्ट्रीय स्तर पर कविता के मर जाने की घोषणा और अब तक लिखी अधिकांश कविताओं को हिंद महासागर में शीघ्रातिशीघ्र प्रवाहित कर देने के मशविरे के बावजूद कवियों की जनसँख्या में बढ़ोत्तरी क्यों दर्ज  हो रही है ?इन सवालों का सीधा -सा जवाब मेरे पास है |मेरे शहर में अब केवल वही गतिविधि चला करती है ,जिसके साथ किसी ऐसे  व्यापार की संभावना मौजूद हो ,जिसमें मुनाफे का कोई समीकरण चलता है |लेकिन  ऐसा अनायास नहीं हुआ |इसके कारणों की पड़ताल के लिए हमें साठ-सत्तर के दशक में वापस लौटना होगा |यह वह समय था जब मेरठ लुगदी साहित्य की एक बड़ी मंडी बना |तब गद्य लेखन के जरिये  धनार्जन के उस राजमार्ग पर मेरे शहर के तमाम कहानीकार रातोंरात सन्निकट सम्पन्नता की चाह में चल पड़े |उन दिनों अपनी लिखी कहानियों की पोथियाँ कांख में दबाए कहानीकारों का हुजूम ईश्वरपुरी और हरिनगर में दिन भर दिखाई दिया करते  थे |उनमें से कुछ अपने नाम को ब्रांड बनाकर धनार्जन में कामयाब हुए ,कुछ नाम छद्मनाम होकर संतुष्ट हो लिए  और कुछ सार्थक लिखने के चक्कर में गुमनाम रह गए |फिर हुआ यह कि बुद्धुबक्से ने लुगदी साहित्य को लील लिया|पर लुगदी साहित्य की मंडी में एकबार जो गया वो चला ही गया ,उनमें से किसी को मुख्यमार्ग पर  वापस आते किसी ने अभी तक  नहीं देखा |
                        मेरे शहर के कवि सौभाग्यवश ऐसी किसी मोहभंग की प्रक्रिया से नहीं गुज़रे |उनके लिए कवि सम्मेलन नामधारी मंडी में  अपनी पैठ बना पाने की संभावना मौजूद रही |कवियों  के आठ -आठ ;दस -दस के समूह एक -एक अदद संस्था बना कर उसके जरिये जनता की मांग के अनुरूप कविताएँ लिख कर उनके सस्वर पाठ का रियाज़ करते जोड़ जुगाड़ के माध्यम से कविसम्मेलनी बुलावे की आस में दिन बिताते जीते रहे ||ये कवि आज भी ऐसे ही मुगालतों के साथ जिंदा हैं |और देखिए…….उम्र के चढ़ाव के साथ मुगालते जवां होते जा रहे हैं |किसी ने चीख को अपनी कविता को आधार बनाया , तो किसी ने अपनी अधनंगी कामनाओं को शाब्दिक लिबास पहनाकर गीत रचे ,किसी ने किशोरावस्था में किसी से हुए एकपक्षीय प्रेम की खातिर लिखे प्रेमपत्रों को कविता का नाम दिया  ,किसी की यह जिद रही कि चुटकुलों को हाँस्य कविता माना जाये |पर हुआ कुछ भी  नहीं और इनमें से  अधिकांश की जिंदगी ट्रेजडी की  अकथ गाथा बन कर रह गई |
                       मेरा कहना तो यह है कि मेरे शहर के साहित्यिक अवदान की इस  दुखांत गाथा का अधिकांश भाग अभी तक अनकहा ही है |मेरा नम्र निवेदन है किअकादमिक हलकों के लोग और   शोधार्थी अपनी ऊब से बाहर  आयें और इसे अपने शोध का विषय बनायें |
                        

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

एक अप्रवासी बहन के नाम पत्र


एक अप्रवासी बहन के नाम पत्र
......................................
सात समन्‍दरों की
मिथकीय दूरी को लांघ
एक नाजुक से धागे का
या चावल के चंद दानों
और रोली का
बरस-दर-बरस
मुझ तक निरापद चला आना
हैरतअंगेज है!

खून से लबरेज
बारूद की गंध को
नथुनों में भरे
इस सशंकित सहमी दुनिया में
तेरे नेह का
यथावत बने रहना
हैरतअंगेज है!

दो संस्‍कृतियों की
सनातन टकराहट के बीच
सूचना क्रांति के शोरोगुल
और निजत्‍व के बाजार में
मारक प्रतिस्‍पर्धा के बावजूद
मानवीय संबंधों की उष्‍मा की
अभिव्‍यक्ति का
सदियों पुराना दकियानूसी तरीका
अभी तक कामयाब है
हैरतअंगेज है!

तमाम अवरोध हैं फिर भी
कुछ है जो बचा रहता है
किसी पहाड़ी नदी पर बने
काठ के पुल की तरह
जिस पर से होकर
युग गुजर गए निर्बाध
भावनाओं की आवाजाही की तकनीक
अबूझ पहेली है अब तक
हैरतअंगेज है!

मेरी बहन;
कोई कहे कुछ भी तेरे स्‍नेह-सिक्‍त
चावल के दानों से
प्रवाहित होती स्‍नेह की बयार का
तेरे भेजे नाजुक से धागे
के जरिए
मेरे मन के अतल गहराइयों में
तिलक बन कर सज जाना
बरस-दर-बरस
कम से कम मेरे लिए
कतई हैरतअंगेज नहीं है

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

उत्सवी माहौल में अँधेरा


यह उत्सवों का मौसम है|धूप का पैनापन कम हो रहा है |ठण्ड की मद्धम -सी पदचाप को रातों में सुना जा सकता है |दिन में अभी भी गर्मी अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए संघर्षरत है |निजी संबंधों में आ रहे निरंतर ठंडेपन के बावजूद प्रकृति अभी भी यथासम्भव गर्माहट बनाए रखने की अपनी हठ पर उसी तरह कायम है जैसे घर का कोई बुजुर्ग अपनी उम्र को नज़रंदाज़ करता हुआ बीते हुए सुनहरे पलों को बारबार जीने की जिद करे |सच तो यह है कि समय तो बहता पानी है ,जो एक बार जहाँ से होकर  गुज़र गया  तो वहाँ लौट कर कभी नहीं आता |हमेशा नूतन और आद्यतन बना रहना ही जीवन है |
           नवरात्र और दशहरे के बाद पर्वों का एक सिलसिला शुरू हो जाता है |नवरात्र से पहले श्राध होते हैं ,जब हम अपनी समझ ,धार्मिक बाध्यता और परम्परा के अनुसार अपने दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करने का काम करते हैं |पितरों की अतृप्त आकांक्षाओं की तृप्ति के लिए हम क्या -क्या नहीं करते |खूब पूड़ी –कचौरी, साग- भाजी ,देसी घी का हलुआ बनता है ,जिसे सब खाते खिलाते हैं |इन दिनों तला -पका न खाने की चिकित्सकों की हिदायतें भी अपनी अर्थवत्ता खो बैठती हैं |किसी अपने प्रियजन को याद करने का इससे अधिक उत्सवी तरीका और क्या हो सकता है भला | इस प्रक्रिया में हमारे दिवंगत पूर्वज कितने संतृप्त हो पाते हैं ,इसका पता किसी को नहीं क्योंकि मृत्यु उपरांत के बाद के जीवन का  अतापता मालूम करने के लिए मरना ज़रूरी शर्त है |अतिउत्साही सत्यान्वेषी भी इसी शर्त के आगे हमेशा  परास्त होते रहे हैं |बहरहाल ,ऐसे ही सांकेतिक प्रदर्शनों से ही हमारा इहलोक समृद्ध और परलोक निरापद और सुरक्षित बनता है ,यही हमारी सनातन सोच और धर्म की अवधारणा है |ऐसे में कुछ  सवाल तो प्राय: निरुतरित ही रह जाते  हैं  कि अपने जीवित बुजुर्गों के प्रति हमारी सदभावना ,प्रेम और श्रृद्धा की इस   उर्वरा भूमि  पर अब नागफनी ही क्यों उगाई जाती हैं ?वानप्रस्थ आश्रमों ,वृद्धाश्रमों और ओल्डएज होम के मुख्य द्वारों पर लटकते  हाउसफुल के बोर्ड हमें लज्जित क्यों नहीं करते ?

अभी नवरात्र आये थे |हमने सुख ,समृधि ,निरोगी काया प्रदाती शक्ति की अजस्र स्रोत माओं को पूर्ण भक्ति भाव से नमन किया |ऐसा हम जाने कबसे बरस दर बरस करते आ रहे हैं |इन देवियों को ,जिन्हें हम माँ कह कर पुकारते हैं ,प्रसन्न करने के लिए नियम सयंम और विधि विधान से उपवास भी रखते हैं |इन उपवासों के पीछे मान्यता संभवतः यही रहा करती है कि कोई माँ अपने भूखे बच्चे को जब भूखा देखेगी तो अपने सामर्थ्य भर उसकी क्षुदा पूर्ति की व्यवस्था अवश्य करेगी |माँ का तो दिल ही ऐसा होता है जो खुद  भूखी रह कर भी बच्चे के मुख में अपने हिस्से का   निवाला भी रख  देती है |कृपया दिल पर हाथ रख कर बताएं कि इन नवरात्रों में आपको उन माओं  की भी कभी याद आई जो अपनी सन्तिति द्वारा उपेक्षित और सताई हुई हैं और जिन्हें मरने के लिए बिना पर्याप्त भोजन ,चिकित्सा और देखरेख के उनके अपने  घरों की किसी अँधेरी, उमस और सीलन से भरी कोठरियों में मच्छरों ,तिलचट्टों और चूहों के सानिध्य में डाल दिया गया है ?आप चाहें तो इस सवाल के जवाब में कोई नायाब तर्क अथवा झूठ गढ़ सकते हैं |पर ध्यान रहे ,तर्कशास्त्र की लाखों पोथियों से निकला हुई  कोई भी दलील एक दिन आपको उसी कोठरी की ओर ले जाने वाला रास्ता बाधित नहीं कर सकती ,जिसमें  आपकी बीमार बूढी माँ की पीड़ा का एक -एक दस्तावेज़ संरक्षित है  |इतिहास अपने को पूरी बर्बरता के साथ ऐसे ही दोहराता है |
            दशहरा आया और हमने दशानन के पुतले को अग्नि के हवाले करके मान लिया कि सत्य पर असत्य की जीत मुकम्मल हुई |अहंकार पराजित हुआ ,अनीति भस्म हो गई |क्या ऐसा हो पाया ?हम कब तक असत्य ,अहंकार और अनीति के रावणों के वध और उसके दहन के सालाना उपक्रम के मूक दर्शक बने रहेंगे ?एक बार पूरी ईमानदारी से अपने भीतर झांक कर देखें ,तो हो सकता है असली रावण और  उसका राक्षसी  साम्रज्य वहीँ कहीं आबाद मिले |इस उत्सवी माहौल में दीप प्रज्वलित करते हुए ,यदि अवसर मिले तो एकाध दिया अपने मन के उन अँधेरे आलों में रख आना ,जहाँ  वास्तव में निर्लज्ज आडम्बर से परिपूर्ण  बहुत अँधेरा है |

निर्मल गुप्त








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मंगलवार, 20 सितंबर 2011

लंबे का सबक



लंबा दुकानदार  एक सप्ताह के प्रवास के बाद मुम्बई से आज ही लौटा था .वह बहुत उत्साहित था .कसबे के बाज़ार में उसकी नकली जेवरात किराये पर देने वाली इकलौती दुकान थी.विवाह के अवसर पर दुल्हन के पहनने लायक जेवर वह मुहँ मांगे दाम पर किराये पर देकर अच्छा मुनाफा कमाता था.मुम्बई जाकर वह लेटेस्ट डिजाइन की ज्वेलरी लाता था.
वह जब भी मुम्बई जाता तो वहाँ से लौटकर उसे लगता कि अपने बाज़ार के अन्य दुकानदारों के बीच उसका कद कुछ और बढ़ गया है यह सच था कि उस बाज़ार के अधिकांश दुकानदार औसत से छोटे कद के थे.वह उन्हें निहायत निरीह समझता था ,जिन पर  केवल दया की जा सकती थी या प्रवचन दिया जा सकता था .
लंबा दुकानदार इस बार मुम्बई से एक ऐसी बात जानकर आया था ,जिसे वह उन बौने दयनीय दुकानदारों को बता देने को आतुर था .मौका मिलते ही उसने अपना प्रवचन शुरू किया --आमची  मुम्बई तो एकदम झकास है .झकास बोले तो .....उसने वाक्य अधूरा छोड़ कर बौनों की ओर सवाल उछाला .सारे बौने लंबे का मुहँ ताकने लगे.उनकी ये हालत देख कर वह और उत्साह से भर उठा. उसने पास की हलवाई की दुकान से आ रही इमारती तलने से उठ रही दिव्य गंध को अपने भीतर  स्थापित करने के लिए लंबी सांस भरी.फिर बोला -मुम्बई में सब अपने काम से काम रखते हैं .कोई व्यापरी किसी  की फटी में कभी टांग नहीं अडाता.इसीलिए वो इतने कामयाब हैं .एक तुम लोग हो ....
लंबे ने फिर वाक्य अधूरा छोड़ दिया .बौनों में कोतुहल बढ़ गया .
लंबा उन मूर्ख बौनों के इस कौतुहल का कुछ देर मज़ा लेने के बाद बोला ,मैं वहाँ सड़क के किनारे एक दुकान पर बैठा था .तभी दो कारें  आपस में टकरा गईं.मुम्बई के दुकानदार ने तुरंत घोषणा कर दी ,देखना अब वो कार  वाला अपनी कार से बाहर आयेगा जिसकी कार की हेडलाइट टूट कर लटक गई है .और ऐसा ही हुआ.उस दुकानदार ने फिर भविष्यवाणी की ,अब टूटी हेडलाइट  गाली देता हुआ दूसरी कार की ओर बढ़ेगा .उसकी बात एकदम सही थी.ऐसा ही हुआ .दुकानदार ने आँखों देखा हाल जारी रखा ,जिसमे एक और भविष्यवाणी थी ,दूसरी कारवाला अपनी कार का शीशा बंद ही रखेगा और कार के भीतर बज रहे संगीत का लुत्फ़ लेता रहेगा ,जैसे कुछ न हुआ हो.अक्षरशः सत्य साबित हुई उसकी यह बात .
दुकानदार ने बात आगे बढ़ायी -अब देखना ये अपनी भड़ास निकलने और  मदद की उम्मीद में हमारी दुकान की ओर आयेगा और मैं ...उसकी बात अधूरी रह गई .टूटी हेडलाइट दुकान के पास आकर जोर जोर से अपनी व्यथा कहने लगा.दुकानदार  तुरंत अपने दोनों हाथों से पंखा झलने लगा .टूटी हेडलाइट निराश हो कर अपनी कार में जा बैठा और उसे स्टार्ट कर आगे बढ़ लिया .लंबा सारी कथा सुनकर मौन हुआ तो बौने उससे प्राप्त इस ज्ञान के प्रति आभार से भर उठे.
उसी दिन शाम को लंबे की दुकान पर कुछ ग्राहक आये .उनसे किसी बात पर उसकी गरमा गर्मी हो गई .बात हाथापाई तक पहुँच गई .ग्राहक चार थे और हष्टपुष्ट भी .लंबा पिटने लगा .उसने मदद के लिए बौनों को पुकारा .उसने देखा कि सारे बौने अपने दोनों हाथों से पंखा झलते मज़े से तमाशा देख रहे हैं .

शनिवार, 17 सितंबर 2011

मैं और मेरा शहर


मुझे नहीं पता कि मेरे शहर में कुल कितने लोग हैं जो अमरीका की पॉप गायिका स्टीफनी जोआन एन्जलिना जेर्मोंतो को जानते हैं   |इटेलियन मूल की इस पॉप गायिका को  इस नाम से तो कोई कहीं भी नहीं जानता |अलबत्ता  लेडी गागा के   नाम  से विख्यात  इस पॉप सनसनी के  मुरीदों की फेहरिस्त में इस अकिंचन का नाम भी जुड़ गया है | न्यूयार्क में हुए आतंकवादी हमले की  दसवीं बरसी पर लेडी गागा का यह बयान आया -मुझे न्यूयार्क से प्यार है |उससे से मेरा संबध उस पति जैसा है ,जिससे मेरा विवाह नहीं हुआ|
            लेडी गागा के इस वक्तव्य से दो बातें एकदम साफ़ हो गईं कि अमरीका में अभी तक पति नाम के प्राणी और प्यार के बीच एक गहरा रिश्ता बरक़रार है और दूसरा यह कि वहाँ बिना विवाह हुए भी पति हुआ करते हैं|मेरे शहर में तो पति प्रतारणा ,धिक्कार ,सार्वजानिक स्थानों पर पिटने योग्य ,गरियाये जाने लायक हुआ करते  हैं|उनसे प्यार का भला क्या लेना -देना ?परिवार परामर्श केन्द्रों से  जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है ,उससे तो यही पता लगता है |मैं उस पति के सम्बन्ध में कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ जो बिना ब्याह रचाए ही पति का  ओहदा  हथियाने की हिमाकत करते हैं |ऐसे तथाकथित  पतियों के  प्रति तो मैं केवल सहानाभूति ही प्रकट कर सकता हूँ| मेरे शहर में जितनी बेकद्री इस पति नाम के प्राणी की है ,उतनी किसी अन्य जीव जंतु की नहीं |वे तो ताडन के शाश्वत अधिकारी माने गए हैं|मुझे उम्मीद है कि लेडी गागा ने जब न्यूयार्क से अपने लगाव के सम्बन्ध में अपनी भावनाएं व्यक्त की होंगी तब उनके मन में यकीनन कोई दुर्भावना या कटाक्ष का भाव नहीं रही होगा|कला से जुड़े लोगों में अभी इतनी संवेदनशीलता है कि ग़मगीन पलों में हँसने हंसाने से परहेज़ करें|
            मुझसे आज तक कभी किसी ने नहीं  पूछा कि मैं अपने शहर के बारे में क्या भावना रखता हूँ |लेकिन यदि किसी ने मुझसे पूछा तो मैं कहना चाहूँगा कि इस शहर से मेरा रिश्ता बड़ा उलझन भरा रहा है|इस रिश्ते का खुलासा करने में वे तमाम खतरे मौजूद हैं जो सच बोलने पर सुकरात के समय में थे|समय चाहे कितना बदल गया हो साफगोई के साथ जुड़े गंभीर खतरों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता|वैसे  अब कौन किसको जहर का प्याला पिलाने की ज़हमत उठाता है |मरने -मारने के लिए अनेक बेहतरीन साधन उपलब्ध हैं |जिसकी जैसी औकात ,उसको वैसी मौत|
            मैंने पहले ही अर्ज किया कि अभी ऐसी कोई ज़रूरत पेश नहीं आयी है कि मैं अपने शहर के संबध में अपनी राय का खुलासा करने के लिए विवश हूँ |फ़िलहाल यदि मैं झूठ और सच का घालमेल करके काकटेल परोस दूं तो मुझे विश्वास है  कि चीयर्स -चीयर्स की कुछ मद्धम आवाजें अवश्य सुनाई देंगी|आज़ादी के बाद हमने फरेब को सच मानकर हथेलियाँ पीटने का काम तो  बखूबी |सीख ही लिया है |
            यदि मुझे अपनी बात बिना किसी लागलपेट के कहनी हो तो मैं कहना चाहूँगा कि अपने शहर से मैं प्यार भी करता हूँ और गहरी नफरत भी|मेरा इस शहर से नाता उस बीमार औरत जैसा है जो अपने पति से रात दिन लड़ती है ,गली गलौच करती है ,हाथापाई पर अमादा हो जाती है ,पर उसके सिराहने से उठ कर जाने भर के संकेत भर से सिहर कर उससे लिपट जाया करती है|मेरा इस शहर से सम्बन्ध अमीरों की किसी बस्ती के बीच बनी उस झोपड़पट्टी जैसा है ,जिससे शरीफजादे चाहे जितनी नफरत करें पर जिसकी उपस्थिति उनके लिए  सस्ते कामगार और घर में काम करने वाली बाईयों उपलब्ध कराने की खूबी के चलते अपरिहार्य होती  है |मेरा इस शहर से ताल्लुक  ज्योतिषी के उस तोते सरीखा है जो सबका भविष्यबांचने का दिन रात नाटक करते करते इतना बेबस हो चुका  है कि पिंजरा खुला  रह जाने के बावजूद भी खुले आकाश में परवाज़ नहीं भरता क्योंकि वह उड़ने की कला और ख्वाहिश ही खो चुका है | मेरा शहर गरीब ,मजलूमों, मेहनतकशों के प्रति चाहे जितना असंवेदनशील हो लेकिन वह किसीको अन्ततः पनाह देने में कभी गुरेज़ भी नहीं  करता |इस शहर की फिजाओं  में गुलाब के फूलों की खुशबू भी है और  आत्मा तक को लहूलुहान कर देने वाले बेमुरव्वत तीखे कांटे भी|
            लेडी गागा ने किस सहजता से अपने शहर के प्रति अपनी मौहब्बत का इज़हार कर दिया पर जब मैंने इस काम को करना चाहा तो मेरे मन के अँधेरे कोनों में रखे मेरे शहर के  इतिहास के वे   रक्तरंजित पन्ने फडफडा उठे ,जिन पर मेरे अपने और  पूर्वजों  के स्याह कारनामे दर्ज हैं|लेकिन मैं केवल उन्हीं पन्नों का बखान फ़िलहाल  करूँगा ,जो आने वाले वक्त के लिए रौशन मशाल बन कर हमें सही रास्ता बताने का काम करें|याद रहे मैंने इतिहास के कुछ पन्नों को मोड़ कर छोड़ दिया है ताकि वक्त ज़रूरत उन्हें पेश करने में मुश्किल न हो |इसे आप मेरी कायरता या चतुराई याफिर आत्मरक्षा के लिए संभाल कर रखा गया हथियार , जो चाहे, मान सकते हैं |

निर्मल गुप्त

शनिवार, 10 सितंबर 2011

अंकगणित का उपयोग




लगभग दो दशक पहले मैंने बड़े दुखी मन से लिखा था -यह ऐसा समय है ,जब सुबह का अखबार पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि हम किसी जल प्रलय के बाद नदी में तैरती लाशें गिनने के लिए विवश हों|वह समय था जब अयोध्या में हुए विध्वंस के बाद चारों ओर व्यापक हिंसा हो रही थी |लिखने को तो मैंने लिख डाला था ,पर मन के भीतर एक गहरा आशावाद था कि हालात सुधरेंगे और शवों की गिनती का घृणित खेल खत्म होगा ,हमेशा -हमेशा के लिए|लेकिन अब लग रहा है कि मेरा आशावाद कितना खोखला और आधारहीन था|एक के बाद एक धमाके हो रहे हैं और आम  आदमी अपनी आत्मा  पर लगे  घावों को चाटता हुआ ,मृत शरीरों की गिनती करने को मजबूर है|आंकड़ों पर निगाहें टिकाये तटस्थता का लिबास पहने विद्वान बता रहे हैं कि पिछले पन्द्रह सालों में सत्ताईस बार आतंकवादी अपनी करनी में कामयाब हुए हैं और इन घटनाओं में जितने आमआदमी हलाक हुए हैं ,वे हमारी आबादी के विस्तार के क्रम में नगण्य ही माने जायेंगे.मरने वाले मरखप गए ,बच्चे अनाथ हो गए ,औरतें विधवा हो गईं ,रोज़ी रोटी कमा कर सारे परिवार को चलाने वाला चला गया ,पर इससे हुआ क्या? बड़े -बड़े मुल्कों में तो यह सब होता ही है.विशाल देश है ,कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला,तिस पर जनसँख्या का दैत्याकार प्रसार ,इनकी हिफाज़त कौन कर सकता है भला?दिल्ली में हुए हाईकोर्ट ब्लास्ट के बाद आये राजनेताओं के बयानों से स्पष्ट है कि  विशिष्ट ,अति विशिष्ट ,महत्वपूर्ण ,अति महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा  उनकी शीर्ष प्राथमिकता है.आमआदमी कितने मरे ,कितने घायल हुए ,कितने अपंग ,इनका विस्तृत ब्यौरा रखने का काम तो निरर्थक ही है.गिनने -गिनाने का काम तो चुनावों के अतिरिक्त आमआदमी की ही शीर्ष प्राथमिकता होती है ,वे रखें अपने शवों का हिसाब.सपनों के टूटने का लेखा जोखा .झूठे आश्वासनों के हाथों ठगे जाने की बेलेंसशीट|
मुझे याद है कि बचपन में ककहरा के साथ गिनती और पहाड़े सिखाने के लिए म्युनिस्पैलिटी के उस स्कूल में जाने कितनी बार मेरे  कान उमेठे गए,जिसमे पढ़ने के लिए मुझे रोज धकियाया जाता था.उस स्कूल में एक कड़क मिजाज़ मास्टरनी ने गिनतियाँ सिखाते हुए हिदायत दी थी कि गिनती और पहाड़े में जितने अधिक प्रवीण होगे उतने कामयाब इंसान बनोगे .कामयाबी के इसी शार्टकट के महारथी बनने के चक्कर में स्कूल आता जाता राह के पेड़ों को गिनता रहा.कुछ बड़ा हुआ तो झाडियों पर पीली तितलिओं को गिनता रहा.फिर घर की बालकनी में खड़ा होकर उसकी चारदीवारी पर सर टिका कर सड़कों पर आते जाते वाहनों को गिना.कुछ और बड़ा हुआ तो चारदीवारी पर पेट टिका कर मार्ग पर आती जाती सुन्दर लड़किओं को गिना.वयस्क हुआ तो रोमांस गायब हो गया ,अब गिनने के लिए जेब में कुछ सिक्के होते थे और महीने के वे आखिरी दिन ,जो बीतते ही नहीं थे.मेरे शहर में आज भी गणित सीखने का यही तरीका है या कुछ और ,मेरे पास इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है.मेरा मानना है कि केलकुलेटर और कम्प्यूटर के इस युग में गणित में निष्णात होने के अन्य बेहतर तरीके होंगे| वैसे भी कामयाबी के शार्टकट के लिए साधना से अधिक जुगाड़ का अंकगणित अधिक चलन में है|
मेरे शहर के आमआदमी को ,खासतौर पर मेरी पीढ़ी के लोगों को कतई अनुमान नहीं था कि जिस अंकगणित को कामयाबी की कुंजी समझ कर हम बड़े हुए थे उसका उपयोग लाशों की गिनती और भ्रष्टाचार के धुरंधरों द्वारा एकत्र की गई धनसंपदा के विस्मयकारी आंकड़ों को हृद्यागम करने के लिए होना है|दिल्ली हाईकोर्ट धमाके में मरे लोगों की आत्मा की शांति के लिए शहर के सभ्रांत नागरिक और संगठन मोमबत्तियाँ जला रहे हैं ,इनकी मोमबत्ती की लौ सत्ताधारियों या आतंकियों की लापता अंतरात्मा को कैसे और कितना आलोकित कर पायेगी ,इसका पता किसी को नहीं है |


सोमवार, 5 सितंबर 2011

यह है खुला खेल फरूखाबादी
आजकल इंग्लैण्ड में हमारी क्रिकेट टीम की दुर्गति हो रही है |अमरीका में चल रहे यू एस ओपिन में एक एक करके दिग्गज धाराशाही हो रहे हैं |पर हमारे देश में राजनेताओं और नौकरशाहों की तो बल्ले -बल्ले है |वे तो धनार्जन के क्षेत्र में निरंतर नए कीर्तिमान स्थापित करने की ओर अग्रसर है|इस समय हमारे  राजनीतिक परिदृश्य पर खेला जा रहा है -खुला खेल फरुखाबादी|जिसे देखो वही अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजानिक करने की जल्दी में है|बहुत दिनों के बाद अवसर हाथ आया है कि अपनी धन सम्पदा की सार्वजनिक नुमाइश कर सकें|मन में जाने कब से यह तड़प थी कि काश मौका मिले तो जनता जनार्दन को बताएं कि वे क्यों विशिष्ट हैं और तुम  किस प्रकार जन साधारण या आम आदमी|वास्तव में यह वक्त की मांग और ज़रूरत भी है कि आम आदमी को सप्रमाण उसकी औकात बता दी जाये|बात -बात  पर राजनेताओं के खिलाफ झंडा बुलंद करने को आतुर आम आदमी को आइना दिखाया जाना ज़रूरी था|
     राजनेताओं और टाप नौकरशाहों द्वारा सम्पत्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन से उनकी नेकनीयती ,ईमानदारी और सदाशयता का प्रमाण तो मिला ही है,इससे यह भी पता चला है उनका दामन कितना पाक साफ़ है|इससे इस रहस्य पर से भी पर्दा उठ गया है कि राजनेताओं के वस्त्र क्यों इतने धवल और नौकरशाहों के कालर कैसे इतने सफ़ेद दिखा करते हैं|अब कोई साबुन निर्माता यदि यह दावा करेगा कि सफेदी की चमक पर उसका एकाधिकार है तो तत्काल झूठा सिद्ध हो जायेगा|
     आम आदमी अपनी अखबार पढ़ने की लत के चलते विवश होकर जब सुबह उसे पढ़ता है तो कुछ ही मिनट बाद गहरी हताशा में डूब जाता है|किसी के पास करोड़ों का सरमाया है तो किसी के पास अरबों रुपयों का|सभी के पास दो -चार रिहाईशी मकान ,कुछ फ्लैट्स,मोटा बैंक बैलेंस ,एफडी ,सोने के ढेरों आभूषण आदि -आदि हैं|तब आम आदमी सोचता है कि हम सिर छुपाने के लिए एक छोटे से घर का सपना पूरा करने में वर्तमान के साथ पूरा भविष्य गिरवी रख देते हैं तब भी उसके सपने का साकार होना संदिग्ध ही रहता है|वह कभी किसी बिल्डर द्वारा ठग लिया जाता है तो कभी किसी बिचोलिये की कुटिलता का शिकार बन जाता है और कभी किसी विकास प्राधिकरण के गडबडझाले का शिकार बन जाता है |बैंक बैलेंस में मोटी धनराशि का तो उसने सपना तक देखना कब का छोड़ दिया है|दो वक्त की रोटी के लिए  राशन,खास मौकों पर पहनने योग्य कपड़ों की व्यवस्था   ,बच्चों को समुचित शिक्षा दिलवाने की जद्दोजेहद,बेटी के हाथ पीले करने के लिए दहेज़ की फ़िक्र के बीच वह तमाम कठिनाइयों में जिंदा रह पाता है ,इसे ही  वह ईश्वर की अनुकम्पा मानता है|
सारे लोकसेवक जिस विनम्रता और अदा के साथ अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे रहे हैं,उसमें से आती एक चुनौती की पदचाप को साफ़ सुना जा सकता है|आम आदमी के लिए इसमें एक हिकारत भरी चेतावनी है|अपनी हदों में रहने का कठोर सन्देश है|जाँच एजेंसियों को दिखाया जाने वाला ठेंगा है|पद और सत्ता का अहंकार भी है इसमें|अपनी सम्पदा के इस भव्य प्रदर्शन पर परम संतोष ,गर्व और तुष्टि का भाव भी|देखने दिखाने के इस खेल के जरिये देश  की जनता  के लिए सुस्पष्ट सन्देश यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के मध्य भी परिवर्तित पदनाम के साथ  राजे, रजवाड़ों और  सामंतों की स्वायत्त सत्ता बरक़रार रहती  हैइसीलिए |जाँच एजंसियों के तथाकथित लंबे हाथ भी इनके गिरेबान तक पहुँचने से पहले ही सलाम की मुद्रा में आ जाते है |

शनिवार, 3 सितंबर 2011

पहला सबक

पहला सबक
हाथ में गुलेल लिए
एक शैतान बच्चा
गुज़रा गली से
और गली के पुराने
मेहराबदार मकानों की
मुँडेरों पर पसरे कबूतर
फुर्र से उड़े
और गायब हो गए
आकाश की गहराइयों में कहीं
बस, एक कौआ बैठा रहा
घर की अलगनी में
काँव-काँव करता
बच्चे को चिढ़ाता

कौआ जानता है-
गुलेल से पत्थर फेंकने की
संपूर्ण प्रक्रिया
शैतान बच्चे की
लक्ष्यवेधी क्षमता
और आपातकाल में
आपने बचाव के उपाय

कबूतर जानते हैं-
भरपेट दाना चुगना
गुटरगूँ-गुटरगूँ करना
ऊँचे आकाश में उड़ान भरना
और तीव्र गति से फेंके गए
पत्थर से
आहत हो धरती पर गिर जाना
इसके सिवा कुछ भी नहीं

मासूम कबूतरों की मृत देहों के सहारे
परवान चढ़ी है
शैतान बच्चे की क्रूरता
अब उसकी निगाह
फुर्र से उड़ जाने
वाले कबूतरों पर नहीं
कौए की चतुराई पर टिकी है
बच्चा सीख रहा है
गुलेल को पीठ के पीछे
छुपाकर
अपने मासूम चेहरे को
मासूमियत से ढाँप
दुनियादार होने का पहले सबक