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गुरुवार, 29 मार्च 2012

ये पत्र बड़े जादुई हैं



                         एक समय वो भी था जब पत्र बड़ा कमाल करते थे |इनके जरिये एक दिल से दूसरे दिल तक प्यार की पींग पहुँच जाती थी |तब न एसएमएस था न एमएमएस ,न मोबाईल फोन ,न  इंटरनेट   और न हीं  फेसबुक |फेस टू फेस प्यार का  इज़हार संभव ही नहीं था  |लड़कियों के अभिभावक हाथ में मज़बूत डंडा और जेब में राखी लेकर चलते किसी साये की तरह उनकी निगरानी करते थे |जरा सी चूक हुई नहीं कि डंडे से पृष्ठ पूजा होती  और कलाई में लड़की के हाथों राखी बंधवा कर सद्य प्रेम का पटाक्षेप |बस एक पत्र ही थे जो अपेक्षाकृत सरल, सुलभ और कम जोखिम वाला वह उपकरण थे , जिसके माध्यम से प्रेम गीत कभी –कभी हकीकत में तब्दील हो जाते थे |उन दिनों  कुछ अतिमेधावी प्रेमी प्रेम गीत लिखने का अभ्यास करते रह गए और उनकी प्रेरणा को कोई और ले उड़ा|अभी भी अनेक घरों के पुराने संदूकों में बड़ी हिफाजत से रखे गए ऐसे प्रेम गीतों का जखीरा मिल जाया करता है ,जिन्हें पढ़ कर   लोगों की आँखे छलछला आती हैं| |
                   ये उस वक्त की बात है जब प्यार सिर्फ प्यार था |दो दिलों के धडकनों के बीच बहती पारदर्शी जल से भरी खामोश नदी का पर्याय |तब तक किसी को  प्यार के व्यापारिक मूल्य का कुछ अता पता नहीं था |धीमी रफ़्तार से चलती जिंदगी में भावनाओं की ये  खतोकिताबत रोमांचित भी करती थी और दैहिक प्यार को शब्दिक अभिव्यक्ति भी देती थी  |उस समय शायद ही कोई ऐसा रहा होगा जिसने जवानी की दहलीज़ तक पहुँचते न पहुँचते इसे महसूस न किया हो |हालंकि उस समय में भी हमारे समाज में नैतिकता के स्वयम्भू पहरूओं की कतई कमी नहीं थी जो प्यार की गंध पाते ही आदमखोर हो जाते थे |मेरे मोहल्ले की गली नम्बर पांच में रहने वाले एक युवक की  गली नम्बर दो में रहने वाली लड़की से आँखे चार हुईं तो युवक ने अपने प्रणय निवेदन को कागज पर दर्ज़ करके उसे एक ढेले पर लपेट कर लड़की की ओर आकाश मार्ग से उछाल दिया |गली नम्बर तीन में रहने वाले एक इर्ष्यालू ने उसे लपकने की पुरजोर कोशिश की पर नाकामयाब रहा पर गली नम्बर चार में रहने दिलफुंके आशिक ने कोई चूक नहीं की |फिर हुआ ये कि उस पेम पत्र के लीक होते ही ऐसी किचकिच मची कि पूरे मोहल्ले में महीनों तक युवापीढ़ी के चारित्रिक पतन पर मौखिक  निबंध लिखे जाते रहे |
                    पर अब समय बदल चुका है |अब न वो प्यार रहा न वो प्रेमी और न खत लिखने -पढ़ने वाले वैसे शूरवीर |अब तो पत्र कभी कभार ही लिखे जाते हैं |जब लिखे जाते हैं तो अक्सर वो लीक हो जाते हैं |सरकारी दरोदीवारों में आँख कान और नाक उग आये है | स्वचालित हथियारों से लैस पहरेदारों की सुरक्षा में रखे पत्र फरार होकर लेटर बम बन जाते हैं ,जिनके धमाके सरकारी ओहदेदारों को बेचैन कर देते हैं  और मीडिया को दे देते हैं जश्न मनाने का मौका |अब सरकरी तंत्र की गोपनीयता में इतने सुराख़ हैं जिनमें रखा कुछ भी बिखरने से कुछ  नहीं बचता चाहे वो कैग की रिपोर्ट हो , राजकोष ,अतिसंवेदनशील सामरिक महत्व की जानकारी या फिर सेना प्रमुख द्वारा  प्रधानमंत्री को लिखा पत्र |
                  समय चाहे कितना बदल गया हो पर पत्र तो अब भी बड़े जादुई  हैं |बिना किसी आरडीएक्स,बारूद या ईंधन के धमाके पर धमाके किये चले जा रहे हैं |
  


बुधवार, 15 जून 2011

बदलते मौसम में हठयोग


                                   गर्मी का मौसम है .सूरज अपनी फितरत के अनुसार दिन भर सुइयां बरसा रहा है .हम हठयोगी हँसते -हँसते इस चुभन को भी झेल लेते हैं .इसे आप चाहे विकल्पहीनता कहें  या कुछ और पर मेरे शहर का हर आम आदमी जिन्दा ही इसलिए है क्योंकि वह जिन्दा रहने के लिए अपने हठयोग के प्रति आस्थावान है .उमस भरी गर्मी में जब रात के समय बिजली घंटों के लिए नदारद हो जाती है और कटखने मच्छरों का चौतरफा हमला होता है ,तब उस भीषण स्थिति में केवल हौंसला ही कारगर होता है .जब  बच्चे  गर्मी और  मच्छरों के दंश से बिलबिलाते हैं और संपन्न पडोसी के घर में लगा जेनरेटर काला धुआं उगलता वातावरण को खौफनाक चीत्कार से भर देता है तब भी कुपोषण की शिकार माओं की लोरियों  का स्वर मद्धम नहीं पड़ता.यही तो है हठयोग जिसके चलते विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन चलता रहता है .
                                     निरंतर बढ़ती आद्रता की मिकदार और कभी -कभी पड़ जाने वाली बारिश की बौछारें यह आस जगाएं हैं कि कुछ ही दिन की तो बात है जब आसमान में काले कजरारे मेघ उमड़ेगें और बारिश की ठंडी -ठंडी बूंदों से प्यासी धरती गमक उठेगी.मानसून के आगमन की पदचाप सुनाई दे रही है .पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर की यह नज़्म बार बार ज़ेहन में कौंध जाती है -मैं क्यों उसको फोन करूँ /उसके भी तो इल्म में होगा /मौसम की पहली बारिश है.                                                                                       गर्मी है तो बारिश का बेसब्री से इंतज़ार है .वह तो  जब आयेगी तब आयेगी ,पर यह इंतज़ार भी क्या खूब शै है .रूमानियत से लबरेज ,अपने माज़ी को बेपर्दा  और रूह तक को तरबतर कर देने एक खूबसूरत शिगूफा .इंतज़ार ही तो है आस का दूसरा नाम.यही तो है  हमारी प्रार्थनाओं के संभावित सुफल की मरीचिका.हठयोगियों के मनोबल को सुदृढ़ करने वाली वास्तविक वज़ह.कल जो होगा आज से बेहतर होगा ,इसी दर्शन के सहारे तो जिन्दा रहने के लिए न्यूनतम साधनों के अभाव के  बावजूद करोड़ों लोग निरंतर संघर्षरत और  जिंदा हैं.
                               मानसून केरल में  नियत समय से पूर्व आ गया था .मुम्बई को भी समय से पहले ही आकर भिगो चुका है.जानकार लोग बता रहे हैं कि धरती के इस भू भाग पर जहाँ मेरा शहर अवस्थित है वहां भी समय पूर्व अपनी आमद दर्ज करा कर सबको ऐसे चौंका देगा जैसे कभी नौचंदी एक्सप्रेस ट्रेन नियत समय पर सुबह मेरठ पहुँच जाये.सबको अब बारिश का बड़ी शिद्दत से  इंतज़ार है,भले ही वह आकर दिल ही तोड़ दे.बेगम अख्तर ने बरसों पहले गाया था -सोचा था इस बार बरसेगी शराब /बरसात आई तो दिल तोड़ दिया.पता नहीं किस शायर ने किस मुगालते में यह शेर कह दिया था ,यदि किसी बरसात में ऐसा हो जाये तो तमाम शराब व्यवसायिओं  का दिल और आर्थिक हालात का चरमराना तो तय है.यह शेर सरकार की आबकारी नीति पर भी करारा प्रहार है ,इसलिए इस शेर के  रचियेता और गायिका पर देशद्रोह का मुकदमा कायम हो सकता है.
                             गर्मी के बाद बरसात का आना तो निश्चित है पर जब वह आयेगी तो सारी रूमानियत हवा हो जायेगी.निचले इलाकों में घरों में पानी भर जायेगा.दिल्ली रोड जैसी प्रमुख सड़कों पर जलथल समान हो जायेगा.मेरे शहर के लगभग आधे से अधिक रिहाईशी इलाकों में तालाब बन जायेंगे. वहां नादान बच्चे अपने घर के आंगन में कागज की नावें बनाकर नौका दौड़ का आयोजन कर हर्षित होंगे.अविभावक इस बाढ़ को देख जब सिर धुनेगें तब बच्चे तालियों की धुन से जुगलबंदी करेंगे.
                            हम हठयोगी हैं, इसलिए आगामी आपदा को भी ऐसे ही हँसते -हँसते झेल जायेंगे.तब हम  सर्दी की हंसीन गुलाबी रातों के तसव्वुर के साये में खुद को महफूज़ रखेगें.इसी सनातन सोच के साथ हम सदियों से ऐसे ही जीते आये हैं.