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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

फ्रीलांस मुखबिर कभी घटतौली नहीं करते




                 क्या आप कल्लू हलवाई ,गोरे पतंगफरोश ,रामजी सब्जी विक्रेता ,संजीवन नाई,मिश्राजी रिटायर्ड बड़े बाबू ,अबरार नक्शानवीस ,माइकल साइकल मरम्मत मिस्त्री ,हनीफ डेंटर,टिंकू किरानेवाला ,जगमग ड्रायक्लीनर ,बच्चू निठल्ला  ,टिंकू ड्रापआउट ,बैरागी गवैया  ,चुन्नू मुखबिर ,सींकची बाहुबली ,चिड़िया पहलवान ,पानू किमामबाज़ ,युवानेता रग्घू उम्रदराज़,चाटुकार आंटी  ,मटक्को ताई या इनसे मिलते जुलते नामों वाले लोगों से भलीभांति परिचित हैं ?इस सवाल   के उत्तर के लिए बस दो ही ऑप्शन(विकल्प )हैं -एक हाँ और दूसरा नही|यदि आपका जवाब नकारात्मक है तो मुझे अत्यंत खेद के साथ कहना होगा कि आपके पास इस शहर में सम्मानपूर्वक जीने की न्यूनतम आहर्ता नहीं है |यदि आपका जवाब हाँ है तो आपको बताना होगा कि इनमें से किसको  को आप कितना जानते और पहचानते हैं और इनसे आपके संबध कितने प्रगाढ़ हैं |
                मैं आपको बताता चलूँ कि ऊपर दिए गए ये सारे नाम काल्पनिक हैं पर इन सभी का अस्तित्व वास्तविक  है और ये ही हैं जो मेरे शहर के अलिखित संविधान के पटकथा लेखक भी  हैं,निर्माता ,निर्देशक ,नियामक  और प्रमुख पात्र भी |देश -दुनिया से लेकर घर परिवार तक  की हर ज़रूरी या गैर ज़रूरी घटना पर इनकी त्वरित टिप्पड़ी अंकित होती है और चाहे -अनचाहे उसका अनुपालन करना सभी के लिए सामाजिक रूप से बाध्यकारी होता है |अखबारवालों के लिए ये  सूचना की विश्वसनीयता की जमानत हैं |घाघ पुलिसिये जानते हैं कि इलेक्ट्रानिक सर्विलांस असफल हो सकता है पर इनके दिए क्लू में कभी खोट नहीं मिला करती |अपने अन्य धंधों में ये चाहे जो करते हों पर  सूचना उपलब्ध कराने के मामले में घटतौली कभी नहीं करते |  ये ऐसे विचारक हैं जिनका हर कथन ध्यानपूर्वक सुना   और सराहा जाता है |अपने नियत ठियों के अलावा इनका गली कूंचों के लैम्पपोस्ट के इर्द - गिर्द ,अँधेरे कोनों में यहाँ वहाँ ,पान के खोखों के आसपास ,घरों की चौखट पर  गृहस्वामिनी के कान के नज़दीक और चायखानों के बोसीदा बेंचों के दरमयां  बसेरा रहता है |इनसे लोग डरते भी हैं ,कतराते भी हैं, फिर भी  इनकी उपस्थिति को सामाजिक रूप से एक आवश्यक बुराई के रूप में अंगीकार किये हैं |सारी अफवाहें इनसे ही शुरू होती हैं और सच झूठ की बदनाम गलियों से गुज़रती हुई किसी के लिए चटखारेदार चटपटी बतरस ,किसी के लिए सच का सामना और किसी के लिए कुनेन सरीखा कड़वे  अनुभूत यथार्थ का आकार गृहण कर लेती हैं |ये इतने  सर्वव्यापी और सर्वज्ञानी होते हैं कि बिना किसी अत्याधुनिक सूचना तकनीक के इनके पास सदैव  पुख्ता जानकारियां रहती हैं  कि मोहल्ले की कौनसी लड़की किस लड़के के साथ फुर्र होने की योजना बना रही है ,कौनसी बहू अपने साथ दहेज में मिनी स्कर्ट लायी है और वह अपने सास -ससुर से छिपकर कब -कब और कितनी बार उसे  पहन चुकी है ,किसका लड़का परीक्षा में फेल होने के बाद नकली मार्कशीट बनवाने की जुगाड़ में है ,बंद गली के आखिरी मकान में रहने वाला वीररस का  ओजस्वी कवि अचानक प्रेमरस में डूबी हुई कविताएँ किसे इंगित कर लिख रहा है ,कौन सा भावी सांसद,विधायक या पार्षद ,किस गली के किस -किस मकान में नकली वोटरकार्ड बनवाने की जुगत कर रहा है ,तीसरी गली के चौथे मकान में रहने वाले  फैक्ट्री में हुई तालाबंदी के कारण अरसे से  बेरोजगार सुपरवाइजर के घर की  रसोई से अब दोनों समय  मटन चिकिन पकने  की गंध कैसे  आने लगी है,चार हज़ार रूपये मासिक की पगार पर नौकरी करने वाली उस  लड़की के गले में कीमती नैकलेस कैसे आया जो कल तक गली के पंसारी का पूरा क़र्ज़ कभी न चुका पाई थी |लब्बोलुआब यह कि उनसे कुछ भी छुपा नहीं |कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इनको अपनी गली से गुजरने वाली हर लड़की के सीने में खोंस कर रखे गए रूमाल का रंग तक पता रहता है |इनकी आँखों से एक्सरे प्रवाहित होती हैं ,जो सात पर्दों में छुपा भी जान लेती हैं |
                 इनकी महिमा अपरम्पार है |इनकी थाह कोई नहीं समझ पाया|इसके बावजूद इनका किसी नए -पुराने अंडरवर्ड सरगने से प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई सम्बन्ध नहीं रहा करता  |ये तो अपनी आदत से विवश ऐसे फ्रीलांस सत्यान्वेषी हैं ,जिनकी संत कबीर की तरह न तो किसी से दोस्ती है न किसी से बैर |इनका होना कभी किसी के लिए  मुसीबत का सबब बनता रहा  है तो कभी किसी के लिए असलियत जानने के लिए  सरलता से मिल जाने वाला चोर रास्ता |
              यकीनन ये मेरे शहर के ओपिनियनमेकर हैं ,ऐसे स्वछन्द टिप्पड़ीकार जिनकी मेधा की सही शिनाख्त के बिना  सुचारुरूप से  मेरे शहर में रामभरोसे   चलती आपके जीवन की गाड़ी कभी भी कहीं भी पटरी से उतर सकती है |मेरा नम्र सुझाव है कि इन्हें जितनी जल्दी संभव हो ठीक से जान लें |इन्हें आपकी कम ,आपको इनकी अधिक  ज़रूरत बार -बार पड़ेगी |

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

मजनू इतना गया गुज़रा तो नहीं था

फिर वही हुआ |मेरे शहर में लड़कियों के साथ छेड़छाड करने वालों के खिलाफ जिस उत्साह और त्वरित गति से पुलिसिया अभियान चला था वो चंद प्रेमनिर्पैक्ष लोगों को सरेबाजार लज्जित ,अपमानित और प्रताड़ित करने के बाद उससे भी अधिक तीव्र गति से  अपनी अधोगति को प्राप्त हो गया |पहले भी यही हुआ था ,पुलिस पार्कों में ,झाडियों में ,किसी शिला के पीछे ,पेड़ों के झुरमुट में ,किसी चाय के खोखे में ,यहाँ- वहाँ ,मजनू के वंशजों को पकड़ने -पीटने का सार्वजानिक प्रदर्शन करती रही  और वास्तविक प्रेमपुजारी अपनी -अपनी निरापद खोहों में बैठ कर अपनी लैलाओं को रसपगे एसएमएस और नयनाभिराम एमएमएस भेजते रहे|तब खबर तो यह भी थी कि पुलिस के कुछ उत्साही अधिकारियों ने ऐसे मजनूओं को पकड़ लिया, जो सरेराह किसी अनजानी सुन्दरी के समक्ष अपने प्रेम के प्रस्ताव की अभिव्यक्ति करना तो दूर अपने घर के बेडरूम तक में  अपनी विवाहिता पत्नी के सामने प्यार का इज़हार करने की सोचते ही हकलाने लगते हैं |
               मेरा मानना है कि पुलिस के काम करने का अपना तरीका है ,ये इतिहास से कभी कुछ नहीं सीखते |वे अपने इतिहास के  पन्नों पर दर्ज इबारत को  बार -बार दुहराते हैं और नाकाम होते ही तुरंत इतिहास का एक और पन्ना दुहराने के लिए यह सोच कर पलट लेते हैं कि कामयाबी का शैतान बच्चा वहाँ नहीं तो यहाँ तो ज़रूर  छुपा हुआ मिलेगा ही |संभवतः पुलिसिया संस्कृति में किये गए कार्यों के साथ उनके नतीजों को अंकित करने की कोई परिपाटी कभी रही ही नहीं |उन्हें नहीं मालूम कि इतिहास की आकृति हमेशा वृताकार नहीं होती ,बदलते समय के साथ इतिहास कभी समय के समानांतर आगे बढ़ता है तो कभी -कभी किसी पेटर्न की परवाह किये बिना किसी अनाड़ी कलाकार द्वारा यूं ही खींची गयी आडी तिरछी रेखाओं के रूप में |जरा अपने समय के इस बनते हुए इतिहास को गौर से देखें , आपको एब्सर्ड शैली के किसी कलाकार द्वारा बनाई गई भूलभुलैया गलियों के मकडजाल की विहंगम तस्वीर दिखेगी |
                मुझे इस बात का ठीक से नहीं पता कि इस प्रकार के अभियान को मजनू का नाम क्यों दिया जाता है |यकीनन मजनू इतना गया गुज़रा नहीं था कि उसकी शिनाख्त शहरी शोहदों ,लफंगों,मनचलों या फिर सिरफिरों के साथ की जाये |मजनू का नाम तो  किसी के प्यार में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले ऐसे  अप्रतिम प्रेमी  के रूप में समय की शिलाओं पर अंकित है ,जिससे  प्रेमपथ पर निर्भीकता से कदम बढ़ाते प्रेमीजन युगों -युगों से प्रेरणा हांसिल करते आये हैं |उसने अपने प्यार की खातिर किसी को मारा नहीं ,किसी को मरने के लिए बाध्य नहीं किया |वह  किसी के प्यार में खुद  मरा तो भी मरकर भी कहाँ मर पाया ,वह तो अजर  अमर हो गया |उसने कभी किसी राह चलती लड़की पर फब्ती नहीं कसी,किसी सुन्दरी को देख उसका पीछा नहीं किया ,किसी को प्यार करने के लिए धमकाया नहीं ,किसी के साथ बलात्कार नहीं किया, किसी को विवाह का झांसा देकर उसका दैहिक शोषण नहीं किया ,किसी को बेहूदा एसएमएस नहीं भेजा ,किसी का अश्लील एमएमएस बना कर यूटयूब पर डाउनलोड नहीं किया |तब  उसकी पवित्र स्मृति के साथ ये बेजा खिलवाड़ क्यों ?
                   प्रेमी तो और भी हुए हैं ,कुछ सुनामधन्य और कुछ कुख्यात भी|सुनामधन्य जैसे हीर -राँझा ,शीरी -फरहाद ,सोनी -महिवाल और...और ... सैफ -सैफीना (इसे आप करीना के नाम से जानते हैं )|कुख्यात नामों की फेहरिस्त पुलिस के दस्तावेजों में अवश्य होगी|इनमें से कुछ नाम तो मुझे भी याद हैं , लेकिन इनके नाम ले कर मैं अपने पीछे खूंखार कुत्तों को  लगवाने की नादानी भला क्यों करूं?भविष्य में ऐसे किसी अभियान को चलाना ही पड़े तो उसका कोई और नाम रखें |इन पवित्रात्माओं के नाम का दुरूपयोग रुकना चाहिए |
                  इसके बावजूद यदि यह जिद है कि ऐसे अभियानों का नामकरण इन प्रेमियों के नाम पर किया जाना है तो मेरी चुनौती है कि बिना किसी लिंग भेद के कभी लैला ,हीर ,शीरी या सोनी के नाम पर इन अभियानों को चला कर देखें |देश भर में नारी विमर्श से जुड़े इतने बुद्धिजीवी ,इतनी संस्थाएं और इतनी मुखर नेत्रियां हैं कि विश्वास करें कि उनकी उग्र  हुंकार के आगे दिन में ही सूर्यास्त हो जायेगा|
                  मजनू तो बेचारा है ,उसका तो हर ऐरा -गेरा नत्थूखेरा  मजाक उड़ा रहा है ,पर इसे देख सुनकर उसकी और लैला की रूह कब्र में बेचैन तो बहुत होगी |किसी के प्यार का ऐसा भद्दा उपहास इतना जघन्य कृत्य है जैसे कोई मैथुनरत क्रोंच पक्षी का वध कर दे या किसी खूबसूरत तितली के पंख नोच डाले या कठफोड़वा की पैनी चोंच को भोथरा कर दे या फिर किसी मसखरे को रोने के लिए बाध्य कर दे |ज़रा सोचें ,क्या प्यार को ईश्वरीय आराधना का दर्ज़ा  देने वाले  इस  बर्ताव के हक़दार हैं ?
निर्मल गुप्त
                  




















 

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

कोई क्यों करे बेकार का स्यापा

       
   कहना आसान है पर इस पर यकीन करना मुश्किल  कि मेरा शहर वास्तव में स्थितिप्रज्ञ हो गया है |पिछले दिनों हरिद्वार में आयोजित गायत्री महाकुम्भ में आयोजकों की हठधर्मिता और उनके अप्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की अक्षमता के चलते बाईस भक्तों को अपने प्राण गंवाने पड़े|लेकिन इस खबर को जानने के बाद अतिसंवेदनशील श्रेणी के इस शहर में न तो कोई हलचल हुई ,न कोई शोकसभा और न ही किसी सामजिक संस्था ने अपने घडियाली आंसूओं में भीगा हुआ कोई बयान जारी किया |अलबत्ता मेरे व्यथित होने पर एक भावुक सज्जन ने मुझे एक बोध कथा अवश्य सुनाई जिसका सार यह था कि कभी -कभी कोई नाव कुशल नाविक के परिचालन के बावजूद शांत जल में इसलिए डूब जाया करती है क्योंकि उस नाव में दैवयोग से एक पापी भी सवार होता है|एक पापी के सामने कुशलतम नाविक की कार्यकुशलता और अनेक सदाचारी  सहयात्रियों का जीवन होम हो जाता है |उनका कहना था कि गायत्री परिवार का सद्कर्म, हो न हो ,किसी पापी की उपस्थिति की वजह से ही अकारथ हुआ होगा |
           निसंदेह अखिल भारतीय गायत्री परिवार के संस्थापक प्रज्ञापुरुष आचार्य श्रीरामशर्मा युगदृष्टा मनीषी थे |उनका व्यक्तित्व एक साधु पुरुष ,आध्यात्म विज्ञानी ,योगी दार्शनिक ,मनोवैज्ञानिक लेखक ,सुधारक ,दृष्टा और निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी का समन्वित रूप था |उनकी जन्मशताब्दी पर आयोजित इस गायत्री महाकुम्भ पर जो हुआ, उससे उनकी पवित्र आत्मा भी ज़रूर लज्जित हुई होगी |सूचना तो यह है कि जब भगदड़ के चलते चारों ओर मर्मान्तक चीखों से वातावरण गहन पीड़ा से भरा था तब उनके चेले 1551 कुंडीय यज्ञ में आहुति देने और गायत्री मन्त्र के उच्चारण में ऐसे निमग्न थे कि उन्होंने उन चीखों को सुना ही नहीं या सुनकर अनसुना कर दिया |उनके लिए तथाकथित विश्वकल्याण के लिए आहुति और मंत्रोच्चार इतना अधिक महत्वपूर्ण था ,जिसके सामने महज बाईस लोगों की मौत का कोई मूल्य नहीं था |यज्ञ निर्विघ्न पूरा हुआ ,विश्व सुरक्षित हुआ ,तमाम वीआईपी आये ,आयोजक उनके बगलगीर हो लिए ,परिवार की कीर्ति की दुन्दुभी बज उठी ,धर्म की पताका खूब लहराईं|भक्त आये और खूब आये ;पूर्ण भक्तिभाव से आये ,भक्तिरस में सराबोर होकर गए |कुछ जिन्दा वापस घर नहीं जा सके तो क्या ,महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी को तो  बलिदान करना ही था |
             संभवतः मेरे शहर के लोग पर्याप्त परिपक्व हो चुके हैं ,उन्होंने  मान लिया है कि धर्मकर्म के मसलों में  सर्वश्रेष्ठ भूमिका मूक दर्शक की होती है |वैसे भी मेरा शहर आसन्न विधानसभा चुनावों की आहट सुन पा रहा है |इस लोकतान्त्रिक महापर्व से एन पहले व्यर्थ के स्यापे करके सारा मजा किरकिरा कोई क्यों करे |मेरे एक विद्वान मित्र ने कहा -वहाँ मरने वाले भक्त नहीं अंधभक्त थे |उनका यह कथन लगभग सारे शहर की मानसिकता की निशानदेही करता है |अतीत में हम अपनी अपनी धार्मिकता के साये में इतना लड़भिड चुके हैं कि अब हमारी और अधिक लड़ने की इच्छाशक्ति का समापन हो चुका है |हमारे इस साम्प्रदायिक जुझारूपन पर सारी दुनिया इतना थू -थू कर चुकी है कि यदि दुनिया के सामने ऐसे ही किसी मसले पर आगामी दस बीस बरसों तक दुबारा  थूकने की की ज़रूरत पेश आई तो उसके सूखे हुए मुह से गर्र-गर्र की आवाज़ ही निकलेगी |
             मुझे नहीं पता आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा लिखित उनके  हजारों सारगर्भित सुभाषितों को उनके भक्तों ने कितना पढ़ा है और उन्हें पढ़ कर अपने जीवन मे उतारने की कितनी गंभीर कोशिश की है |उनके देहवसान के केवल इक्कीस वर्षों के भीतर उन्होंने उन्हें एक मनीषी से इतर एक कल्टफिगर बना कर अपने -अपने स्वार्थों की निजी दुकानें खोलने की जल्दबाजी की है |यदि कुछ लोग आचार्य के इस दिव्य उक्ति को बिसरा बैठे हों तो उन्हें याद दिला दूं ,उन्होंने कहा था -अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई नहीं हो सकता |
                  आचार्य श्री राम शर्मा ने यह भी लिखा था -अपनी प्रशंसा स्वयं न करें ,आपके कृत्य यह काम दूसरों से खुद करवा लेंगे |उन्हें किसी आडम्बर की आवश्यकता जीवनपर्यंत नहीं पड़ी ,इस शातब्दी वर्ष में क्या हम उन्हें अधिक शालीन तरीके से स्मरण नहीं कर सकते थे |
                  उनकी ही लिखा एक अन्य सुभाषित भी काबिलेगौर है –दुःख का मूल है पाप |पाप का परिणाम है –पतन ,कष्ट ,कलह और विषाद |यह सब अनीति के अवश्यंभावी परिणाम है |
निर्मल गुप्त
                 
           

           

शनिवार, 5 नवंबर 2011

सड़कों पर रेंगता फार्मूला वन का रोमांच


                फार्मूला वन की गाडियां जब ग्रेटर नॉएडा के रेसिंग ट्रैक पर दुनिया भर के कार चालक  साढ़े तीन सौ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार भर कर एक दूसरे को पछाड़ने में लगे थे ,तब मेरे शहर की सड़कों पर लगभग पांच किलोमीटर प्रतिघंटा की औसत  स्पीड पर रेंगती गाडियां तमाम साइकिलों,रिक्शाओं ,घोड़े  तांगों और हाथ ठेलों से लगातार  पराजित होती हुई वाइब्रेंट मेरठ की ऐसी इबारत दर्ज करने में मशगूल थीं ,जिसे पढ़ने के बाद आक्सफोर्ड डिक्शनरी के निर्माता  वाइब्रेंसी  शब्द के लिए नए मायने ढूँढने की ज़रूरत महसूस कर रहे होंगे| |इस कार रेस को देखने के लिए देश - दुनिया  से लोग आये ,जिनमें  अनेक ऐसे स्टार, सेलिब्रिटी और आइटम गर्ल भी थीं,जो सात समन्दर की मिथकीय दूरी को लाँघ बाकायदा  टिकट खरीद कर महज इस अकल्पनीय स्पीड के रोमांच के साक्षी बनने के लिए यहाँ आये थे |लेकिन  मुफ्त कम्प्लीमेंटरी पास न मिल पाने से आहत राजधानी के अधिसंख्य सत्तापुरुष अपने -अपने कोपभवनों में  बैठे कर यही बयान जारी करते रहे कि यह तो धनबल का अपराधिक दुरूपयोग है , धन का सदुपयोग तो गरीबों के कल्याणार्थ होना चाहिए|
              मुफ्त कम्प्लीमेंटरी पास का न मिल पाना ,कितना तिलमिला देने वाला अनुभव होता है ,इस बात को मेरे शहर के लोगों से बेहतर भला  कौन जानता है |इसी के ज़रिये तो  पता चल पाता है कि किसकी अपने  शहर में कितनी और क्या औकात है |बंदर के नाच हो या कुत्तों की झपटमारी का प्रदर्शन ,कवितापाठ हो या शास्त्रीयगायन या फिर  किसी अल्पवस्त्रधारी नृत्यांगना का प्रदर्शन ,यदि  उसे देखने के लिए अग्रिम पंक्ति का मुफ्त पास आयोजकों की मानवीय चूक के चलते किसी स्वनामधन्य को  न मिल पाना ठीक वैसा ही है जैसे कोई शोहदा ब्यूटीपार्लर से सज संवर के निकलती युवती की ओर फिकरा उछालने के विलम्ब कर दे |जैसे कोई पति अपनी पत्नी के द्वारा पकाई गयी आलू की  सब्जी को बेस्वाद  कहने का दुस्साहस कर बैठे |जैसे कोई मातहत अपने अधिकारी की लिखी किसी टिप्पड़ी की भाषा में हिज्जे संबधी कोई भूल इंगित कर बैठे |जैसे कोई उपसंपादक अपने अखिल भारतीय ख्याति के संपादक के लेख में दर्ज किसी तथ्यात्मक भूल को दर्शाने के लिए उस पर लाल पेन से घेरा बना दे|जैसे कोई विवाहित पुरुष  अपनी सास को लेकर आने वाली ट्रेन का सही समय भूल जाये| जैसे……..    फेहरिस्त बहुत लंबी है |संक्षेप में समझ लें ,ऐसी भूलें  अक्षम्य होती हैं|
              फार्मूला वन के आयोजक धन्य हैं ,उनके फ्री पास न देने के  इस साहस को नमन करने का मन करता है |लेकिन इससे किसी परम्परा की कोई शुरुवात नहीं होने वाली |इसे आप किसी ऐसे रोमांचकारी स्टंट का प्रदर्शन मानें ,जिसके साथ उसे खुद- ब -खुद न दोहराने की चेतावनी संलग्न रहती है |इतिहास ऐसे बलिदानियों की गाथाओं से भरा पड़ा है जिनकी वीरता हमें अभिभूत तो  करती रही  है ,पर उनकी राह पर चल पड़ने की गलती शायद ही किसी ने की हो |पड़ोसी के घर जन्मा भगत सिंह सब के लिए आदरणीय है ,अपने बच्चों  को आत्मघात करता कोई नहीं देखना चाहता |
               मेरे शहर के लोगों में  सड़कों पर खुले मेनहोलों  गड्ढायुक्त सड़कों पर बेतरतीब ट्रेफिक के मध्य हवा की रफ्तार से प्रतिस्पर्धा करती मोटरसाइकिलों के जरिये आसन्न मौत की आशंकाओं के बावजूद खतरों के खिलाड़ी बनने की न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने की इच्छाशक्ति नहीं है |वे तो खुद को नटवरलाल के मानसपुत्र बनने में ही अपनी और सारे समाज की भलाई देखते हैं |यहाँ के बच्चे -बच्चे को पता है कि ये फ्री कम्प्ली मेंटरी पास कितने कारगर होते हैं |इनसे प्रशासकीय औपचारिकताओं की जटिलतम वर्गपहेलियाँ कितनी सुगमता से हल हो जाती हैं |शासकीय व्यवस्था के जंग खाए ताले स्वत: खुल जाते हैं |लचर से लचर कार्यक्रम को समाचारपत्रों में भरपूर सचित्र  कवरेज और शानदार रिव्यू मिल जाते हैं |
            मेरे शहर के  किसी बाशिंदे को फार्मूला वन के रोमांच में भागीदार न हो पाने का कोई मलाल नहीं है |उससे अधिक रोमांच का  तो हम यहाँ की सड़कों पर  रोज ही साक्षात अनुभव करते हैं ,जहाँ से सुरक्षित घर पहुँच गए तो बिना किसी कम्लिमेंटरी पास के पास हो जाते हैं|  ऐसा न हो पाने की स्थिति में स्वर्गीय हो कर इस पास -फेल की दुनियावी मोहमाया से मुक्त होने के  रास्ते में कभी कोई स्पीड ब्रेकर ,बेरिकेड या ट्रेफिक जाम कभी नहीं मिला करता |
निर्मल गुप्त