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शनिवार, 21 जुलाई 2012

बापू नहीं सिर्फ मोहनदास कहें




अब तो बात एकदम साफ हो गयी है |सरकार ने महात्मा गाँधी को कभी औपचारिक रूप से राष्ट्रपिता की उपाधि नहीं दी थी |इस देश के लोग उन्हें यूं ही राष्ट्रपिता कह कर पुकारते आये थे जैसे किसी मोहल्ले के दबंग को दादा भईया काका आदि कहने लगते हैं |अब तक हम बापू का असम्मान, आलोचना और उपेक्षा होने पर भावुक हो जाते थे |पर अब इस सरकारी स्वीकोरिक्ति ने बता दिया है कि वह कोई राष्ट्रपिता –विता नहीं हमारी आपकी तरह एक साधारण आदमी थे और एक आम आदमी का कैसा मान और  क्या सम्मान |आम आदमी तो होता ही है सरकारी तंत्र के लिए सकल  ताड़न का अधिकारी |
इस खुलासे ने देश भर के घर  माताओं पिताओं  के लिए अजब असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है |उन्हें लगने लगा है कि उनकी संतति कभी भी यह सवाल खड़ा करके उनकी जान सांसत में डाल सकती है कि आपको किस नियम अधिनियम के तहत माता पिता कहलवाने का अधिकार कब और किसने दिया था ?यदि माता पिता कहलवाने का शौक है तो जाओ, पहले किसी मान्यता प्राप्त आईएसओ प्रमाणित लैब का अपने  डीएनए की जाँच का  प्रमाणपत्र लाओ |
महात्मा गाँधी के लिए अब मामला बड़ा ज़टिल हो गया है |उनके पास अपने पक्ष में कहने के लिए न तो कोई तर्क है ,न वैज्ञानिक साक्ष्य और न ही शारीरिक उपस्थिति |उनके पास केवल देशवासियों से मिलने वाला आदरसूचक संबोधन था ,वह भी तिरोहित हुआ |ले –दे कर दो अन्य आदरणीय विशेषण बचे हैं –बापू और महात्मा |ये विशेषण भी विवादास्पद  हैं |उनको महात्मा कहे जाने से धर्मनिरपेक्ष और तथाकथित धार्मिक पहले से ही असहज रहते आये हैं |धार्मिक उन्हें महात्मा कहलाये जाने के लिए जन्मना अहर्ताओं के अभाव में टेक्निकली अयोग्य मानते हैं और धर्मनिरपेक्षों को किसी भी प्रकार की धार्मिक शब्दावली बर्दाश्त नहीं |उनको हमेशा गाँधी जी के साथ जुड़े इस महात्मा शब्द से ही नहीं  वरन उनके द्वारा गायी जाने वाली रामधुन पर भी  घोर आपत्ति रही है |
बापू के संबोधन में भी कठिनाई है क्योंकि वह अपने पीछे आदर्श ,सदाचरण, देशप्रेम और विचारों का चाहे जो जखीरा छोड़ गए हों पर भौतिक सम्पदा के रूप में अरबों खरबों की प्रापर्टी या  कोई स्विस कोडवर्ड तो किसी को  नहीं देकर गए कि लोग  उन्हें बापू बापू कहते  फिरें  |धनवान बापुओं के लाखों वारिस खुदबखुद पैदा हो जाते हैं और निर्धन  पिताओं को तो पिता कहने में भी बेटों की जुबान दुखती  है |जब तक उनके राष्ट्रपिता होने की भ्रान्ति मौजूद थी तब तक बात कुछ और  थी |लेकिन अब वह किसके  बापू ?
राष्ट्रपिता ,महात्मा और बापू का विशेषण छिन जाने के बाद वह महज मोहनदास करमचंद गाँधी रह गए हैं |अब वह एक ऐसे  आमआदमी हैं ,जिसको मरे खपे अरसा हुआ |यह मुल्क आमआदमी के जब जिंदा होने का संज्ञान ही नहीं लेता ,वह  दशकों पहले स्वर्ग सिधारे व्यक्ति की भला क्या सुध लेगा ?उनका नाम अब न तो जनमानस को झकझोरता  है , न आदर जगाता है ,न किसी वोट बैंक के लिए डुगडुगी बनता  है और न ही हमारी स्मृति को समर्द्ध करता है |मोहनदास कर्मचंद गाँधी  का नाम लगभग छ दशक पूर्व  मृत्यु रजिस्टर में लिखा गया था ,उसकी अब अधिकारिक पुष्टि हो गयी |



गुरुवार, 19 जुलाई 2012

डर्टी डर्टी कितनी डर्टी !!!



दैहिक उत्तेजना से भरपूर रोमांचक आभासी दुनिया के बाशिंदों के लिए एक अच्छी खबर है कि अब डर्टी फिल्म बुद्धू बक्से में प्रकट होगी |नैतिकतावादियों के लिए संतोष की बात यह है कि सेंसर बोर्ड ने काट छांट कर ,धो पोंछ कर ,उसकी गंदगी को बुहार कर उसके  डर्टी अंश साफ़ कर दिये हैं |इस  साफ़ सुथरी फिल्म से अब हमारे मुल्क के चाल, चरित्र और चेहरे पर कोई कालिख पुतने वाली नहीं है |हमारी सरकार हमेशा चारित्रिक सबलता की पक्षधर रही है |वह भ्रष्टाचार को एक ऐसी आवश्यक बुराई मानती है जिसका होना लोकतंत्र की सेहत के लिए ज़रूरी है |उसका मानना है कि एक बार चारित्रिक पतन हुआ तो उसका कोई निदान नहीं,घोटालों की कम से कम  भरपाई तो  हो जाती है |धन तो हाथ का मैल होता है |एकबार हाथ धोए नहीं कि हो गए  साफ़ सुथरे  |
रोमांचवादियों को भी अब तक पता लग चुका है कि जो डर्टी फिल्म टीवी पर दिखाई जायेगी उसमें देखने दिखाने और छिपने छिपाने लायक कुछ होगा ही नहीं |वह तो कुछ वैसी  होगी जैसे कोई सनी लिओन के नाम के मोहपाश में बंधा उसके दीदार को जाये और उसे उसकी नामधारी कोई अन्य महिला भजन कीर्तन करती मिल जाये |रोमांचवादियों का स्पष्ट अभिमत है कि सरकार हो या सेंसर बोर्ड दोनों आमआदमी को कभी कभार मिल जाने वाले हर अस्फुट सुख से कुढते हैं |सरकार को आम आदमी का बीस रुपये की आइसक्रीम खा लेना जघन्य अपराध लगता है और सेंसर बोर्ड को कमोबेश प्रत्येक उस दृश्य पर आपत्ति होती है ,जिसे देख कर देखने वाले के मन में कुछ कुछ होने लगता है |सरकार तो आमआदमी के हर मासूम सपने तक को देशद्रोह मानती आयी है |
नैतिकतावादियों की तो बात ही कुछ और है |वे इस मृत्युलोक में विचरण करते हुए सदैव देवलोक में रहते हैं |उनके लिए यह संसार नश्वर ,पानी केरा बुदबुदा ,कागज की  पुड़िया  (जो  पानी की बूँद पड़ते ही घुल जाती  है),निस्सार और समस्त प्रकार के दुखों का कारक है |देवलोक में वे सभी राजसी सुविधाएँ होती हैं जिनका उपभोग राजा रजवाड़े सामंत धनाढ्य जमींदार ,ब्रांडेड धर्मगुरु ,मठाधीश, गद्दीनशीन सत्तासीन आदि इसी धरती पर जीते जी करते हैं |लेकिन आमआदमी के लिए इस धरती पर उनका उपभोग निषेध है |ये सुख उन्हें मृत्यु उपरांत परलोक में तभी मिलते हैं जब वे इहलोक में सप्रयास कष्टों का वरण और सुखों का तिरस्कार करते हैं |इसीलिए वे इस धरती पर जब तक रहते हैं सदैव खुशियों के खिलाफ मौखिक जंग लड़ते रहते हैं |
रोमांचवादियों और नैतिकतावादियों के अतिरिक्त एक और वर्ग भी है जो सदैव इसी असमंजस में रहता है कि वे इस दुनिया में अधिकाधिक सुख बटोरें या परलोक सुधारने में संलिप्त हों |ये न्यूनतम जोखिम उठाकर अधिकतम मुनाफा कमाने की जुगत में रहते हैं |इनको फिल्मों का डर्टी पक्ष बड़ा लुभाता है पर उसे वे देखते हैं चुपके चुपके |डर्टी पिक्चर के खिलाफ जब कोई मोर्चा निकलता है तो वे अग्रिम पंक्ति में रहते है ताकि उनकी सद्चरित्रता सार्वजानिक रूप से प्रमाणित  हो जाये |वे  हमेशा लाभ की स्थिति में रहते हैं |इनका इहलोक चाक चौबंद रहता है और परलोक में पांच सितारा  सुविधाओं वाली बर्थ आरक्षित रहती  है|
 सेंसर की कतर-ब्योंत के बाद प्राईमटाईम इस फिल्म के दर्शक कहेंगे –डर्टी डर्टी कितनी डर्टी ?नो नो :नो नो यह नहीं डर्टी | अब हम इसमें देखें क्या ?


रविवार, 15 जुलाई 2012

मेरे शहर में: ईश्वर कहाँ रहता है ?

मेरे शहर में: ईश्वर कहाँ रहता है ?: सुबह सवेरे मार्निंग वाक के लिए निकला तो रास्ते में  आकर्मडीज़  मिल गए | हाफपैंट और टीशर्ट पहने वह पसीने में तरबतर थे | मैंने उनसे पूछा ...

ईश्वर कहाँ रहता है ?



सुबह सवेरे मार्निंग वाक के लिए निकला तो रास्ते में  आकर्मडीज़  मिल गए |हाफपैंट और टीशर्ट पहने वह पसीने में तरबतर थे |मैंने उनसे पूछा गुरु ,आप यहाँ |विज्ञानियों ने गाड पार्टिकल खोज लिया है |वे सब खुशियाँ मना रहे हैं और आप यहाँ घूम रहे हैं |उन्होंने जवाब दिया कि ज़माना बदल गया है , हमें कौन पूछता है |वैसे भी किसी कामयाबी को हांसिल करने  पर उनकी तरह ताली पीटना हमें आता नहीं |यूरेका यूरेका करते हुए सड़क पर दौड़ना अब बड़ा जोखिम भरा काम है |
वो कैसे ,मैंने पूछा |
तुम्हारे मुल्क में नंगे आदमी को कुत्ते दौड़ा लेते हैं और पूनम पांडे और सनी लिओन सरीखी को सर माथे पर बैठाते हैं |जिसे बंधा रहना चाहिए वो खुला घूमता है और जिन्हें मुक्त होना चाहिए उनपर लाखों पहरे हैं |  आकर्मडीज़ के जवाब में हताशा थी ,
फिर भी ईश्वर का कुछ अता पता तो मिला |यह एक बड़ी उपलब्धि है |मैंने कहा |
काहे की उपलब्धि जी ,ईश्वर गुम कब हुआ था जो मिल गया |वह तो तब भी था जब मैं अपने बाथटब से निकल कर नंगा सड़क पर दौड़ा था |वह इससे पहले भी था और आज भी है ,हमारे आसपास ,उन्होंने तुरन्त कहा |
ईश्वर लापता तो नहीं था पर उसका कम्प्लीट एड्रेस भला किसके पास था |मैंने प्रतिवाद किया |
कम से कम तुम तो ऐसा न कहो  |यदि ईश्वर लापता होता तो तुम्हारे  यहाँ इतने तथाकथित धर्म गुरुओं ,ज्योतिषियों,तांत्रिकों,नजूमियों  का कारोबार कैसे चलता |वह बहस को आगे बढ़ाने के मूड में थे |
पर आप यह तो मानेंगे कि गाड पार्टिकल मिला है तो एक दिन उसके साक्षात दर्शन भी हो जायेंगे |मैंने फिर कहा |
हाँ हाँ हो जायेंगे |पर उनके दर्शन से होगा क्या ?उन्होंने अत्यंत चुभता हुआ सवाल दागा |
तब हमारी हर दुःख तकलीफ का समाधान हो जायेगा |जीवन खुशियों से भर जायेगा |मैं हार मानने को तैयार न था |मैंने कहा |
अब तक यह काम कौन करता आया है ?तुम्हारा  सरकारी तंत्र तो कभी कुछ करता नहीं |वही है जो तमाम प्रशासनिक निकम्मेपन के बावजूद इस मुल्क को अरसे से चला रहा है |आकर्मडीज़ के स्वर में तल्खी थी |
मैं उनके इस कथन के बाद निरुत्तर होने के करीब था |मैंने एक और कोशिश की,कहा ,ईश्वर के सान्निध्य  की चाहत किसे नहीं होती ?
उसका  सान्निध्य पाकर क्या करोगे ?उसे अपनी चाहतों की वो फेहरिस्त थमाओगे जो उसके पास पहले से मौजूद है |उसे अपनी चालाकियों और बेईमानियों  में  दस या बीस परसेंट का भागीदार बनने का प्रपोजल दोगे |अब भी तो तुम्हारी प्रार्थनाओं में यही सब होता है |उन्होंने कहा|
लेकिन ---फिर भी ---मैं हकलाया |
ईश्वर की उपस्थिति का  यूं सार्वजानिक हो जाना कोई अच्छी खबर नहीं होगी |आदमी से उसकी कुछ दूरी का बना रहना ही ठीक है |उसे शांतिपूर्वक अपना काम करने दो  |उससे मिलने मिलाने की बेकार कोशिश न करोआकर्मडीज़ की आवाज़ मानो  किसी गहरे कुएं से आ रही थी |
मेरे पास अब कहने को कुछ बचा न था |मुझे मौन होता देख आकर्मडीज़ हौले से मुस्कराया और बोला ,विदा दोस्त ,मैं चलता हूँ ,मुझे अभी थोड़ी जोगिंग और करनी है और फिर एक ओल्डएज होम जाना है ,जहाँ बीमार ,निराश, घर -परिवार नाते रिश्तेदारों द्वारा  ठुकराए ,समाज के सताए बूढ़े लोग मेरा इंतज़ार करते होंगे |उन्हें हमारे प्यार दुलार देखभाल की ज़रूरत है |सच कहूँ इस खुदगर्ज़ दुनिया में ईश्वर वहीं रहता है |उसका सही पता किसी  विज्ञानी को  कभी नहीं मिलने वाला |
यकीन मानो ,ईश्वर वहाँ नहीं रहता जहाँ उसे तुम अक्सर ढूँढा करते हो |वह किसी मंदिर ,मस्जिद ,चर्च ,गुरूद्वारे या अन्य इबादतगाहों में नहीं रहता | उसे किसी भजन कीर्तन  कव्वाली तन्त्र मन्त्र या पुरजोर प्रार्थना के जरिये  नहीं पा सकते |वह रहता है हर मेहनतकश के उस निवाले में जिसे वह किसी भूखे के साथ बांटता है ,उस जांबाज़ तैराक की बाँहों में जो डूबते हुए को बचाने के लिए बाढ़ से उफनती नदी में अपनी जान जोखिम में डाल कर कूद पड़ता है ,कुछ नया रचने मे संलग्न किसी कलाकार की जिद में ,अन्याय के खिलाफ डट कर खड़े आदमी की रूह में ,हालात से जूझने वालों के साहस में ,निराशा के घटाटोप में उम्मीद के किसी टिमटिमाते दिए की लौ में या संत कबीर की उस वाणी में जो हर  पाखण्ड को धिक्कारती है |




रविवार, 13 मई 2012

शोकगीतों का कोई अंत नही



मेरे लिखे को पढ़ने के बाद एक मूर्धन्य आलोचक ने सवाल किया है कि मुझे अपने शहर में कभी भी कुछ सकारत्मक क्यों नहीं दिखता |उनकी इस टिप्पड़ी के बाद मुझे लगा कि मेरी दूर दृष्टि में ही संभवतः कोई खोट है कि मुझे अच्छी चीजें या तो दिखाई नहीं देतीं या दिखती हैं तो बहुत धुंधली |वैसे तो समस्या मेरी नज़दीक की नज़र में भी  है |लेकिन मैं ऐहतियातन पास देखने वाला चश्मा डोरी में ऐसे  बांध कर सीने से लगाये रहता हूँ जैसे वह कोई चिड़िया का बच्चा हो जो हाथ से छुटा नहीं फुर्र हुआ |कबूतरबाजी की भाषा में कहा जाये तो कहना होगा कि मैंने अपनी ऐनक के पर कैंच कर रखे हैं ताकि वो इधर उधर न होने  पाये |फ़िलहाल मैं अपनी नजदीकी नज़र से अपने शहर को देखने परखने की कोशिश कर रहा हूँ |
इसे आप संयोग  कह सकते हैं कि मैं अपने शहर के गौरव बिंदु तलाशरहा था और चेन झपटमार पूरे शहर को अपनी झपटमारी के करतबों को खुलेआम दिखाते निर्द्वंद घूम रहे थे |इसमें अनेक महिलाएं लुटी |खूब रोना धोना हुआ |इसी झपटमारी के चलते  अनीता की जान चली गयी |लुटेरे अपने मकसद में कामयाब रहे उनमें से न कोई घायल हुआ ,न पिटा ,न पकड़ा गया |बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी मोटी वारदातें होती रहती हैं |लेकिन मेरे भीतर अभी तक वही कस्बाई मानसिकता रहती है जो दिवंगत अनीता के मासूम बेटे नमन की तरह बात बात पर  सहम जाती  है |अपनी मम्मी को चंद झपटमारों के हाथों बेमौत मारे जाने को वह शायद ताउम्र नहीं भूल पायेगा |क्या इस हादसे के बाद उसकी ज़िदगी और उसे देखने का नजरिया पहले जैसा   रह पायेगा  ?
मेरे शहर में जब अपने युवा होते बेटे की बाईक पर पीछे निश्चिन्त बैठी माँ पुलिस थाने और उसके आला अफसर के आफिस के सामने यूं बेमौत मारी जा सकती है तो यहाँ सुरक्षित कौन है ?आधी रात को कुख्यात काली पल्सर पर सवार तीन –तीन  बदमाश सड़क से पुलिस की चौकस निगाहों को धता बताते धडल्ले से निकल जाते हैं तो इसको क्या कहा जाये ?बदमाशों की कार्यकुशलता पर उनकी शान में कसीदे काढे जाएँ ?पुलिसिया संवेदनशीलता पर यकीन कायम रखा जाये ?या फिर नमन के दुर्भाग्य को नियति की होनी मान कर चुपचाप स्वीकार कर लिया जाये ?
मित्रों ,यह कोई व्यंग्य नहीं है |किसी की मौत पर हंसना सीखने के लिए मेरे शहर को अभी एक लम्बी यात्रा तय करनी होगी  |अपने  तमाम खुदगर्ज़ आचरण  के बावजूद इस शहर के लोगों के आंसू दूसरों की पीड़ा पर अभी तक बरसते हैं |मेरा यकीन करें कि ये आंसू कतई घडयाली नहीं हैं  |इस दर्दनाक हादसे ने अनेक ऐसे असुविधाजनक सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका उपयुक्त जवाब ढूढे बिना निजात नहीं |इन सवालों को किसी टान्ड पर सरका कर यह कहने से काम नहीं चलेगा कि जो हुआ सो हुआ फिर कभी नहीं होगा |मैं ताकीद कर दूं कि प्रोफेशनल लुटेरे किसी की जान की परवाह नहीं करते |इनके दिल न पिघलते हैं न बदलते हैं |इनको इनके उन बिलों से ढूँढ निकालना ज़रूरी है जो इनके आकाओं ने निहित स्वार्थ के चलते उपलब्ध करा रखें हैं |ऐसे ज़रायम पेशा लोगों का कोई मजहब नहीं होता |लेकिन यह रहते यहीं हैं –हमारे इर्दगिर्द|ये किसी दूसरे ग्रह से आये प्राणी नहीं हैं |वे इसी शहर में रहते हैं यहाँ की हवा में सांस लेते हैं |यहाँ का अन्न जल पाते हैं और इसी शहर के  सीने पर खुलेआम मूंग दलते  हैं |क्या इनका पता वाकई किसी को भी नहीं मालूम ?
चंद गुंडों, मवालियों ,चेन झपटमारों ने पूरे शहर का सुखचैन छीन लिया है और मुझसे कहा जा रहा है कि इस शहर की शान में कुछ लिखूं |मैं अभी तक फरेबी शब्दजाल बुनने की कला सीख पाने में असमर्थ रहा हूँ |यही वजह है कि मैं इस शहर के चौखटे के लिए मिसफिट हूँ | फिलहाल तो मेरा दिल दिवंगत आत्मा के प्रियजनों के आंसूंओं से तरबतर है इसलिये   हँसने हंसाने की बात कर पाना मेरे लिए असंभव हैं |इसबार यह शोकगीत पढ़ें और इसे पढ़ने के बाद रोने का मन करे तो संकोच न करें | अभी तो इस शहर के मुक्कद्दर में न जाने कितने शोकगीतों का साक्षी बनना लिखा है |
निर्मल गुप्त
मोब.08171522922

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रविवार, 29 अप्रैल 2012

छी छी ..खी खी खी खी और डर्टी पिक्चर


 

पिछले रविवार को मेरे शहर के समस्त संस्कारवान लोग इस इंतज़ार में थे कि आज तो टीवी पर डर्टी पिक्चर देखने को मिलेगी  | उनके मनों में इसे लेकर वैसा ही उत्साह था जैसा कभी सत्यनारायण की कथा सुनने को लेकर हुआ करता था | दिन में बच्चे ने मम्मी को  पडोसन से कहते सुना –छि:छि: इस फिल्म को भला कौन देखेगा ,यह तो बड़ी डर्टी है |उसी बच्चे ने रात को अपनी मम्मी को पापा से कहते सुना –सुनोजी ,आज रात तो वो पिक्चर आएगी टीवी पर ,देखेंगे खीखी --- खीखी |बच्चा हैरान कि दिन से रात होते मम्मी के विचार कितने बदल गए |उसे नहीं पता कि मम्मी हो या सरकार इनके ख्यालात कभी स्थिर नहीं रहते |सरकार का  कहा तो वैसे ही हर पल अपना आकार बदलता है जैसे पानी |गिलास में गिरा तो ग्लास हो गया ,बाल्टी में रखा गया तो उस जैसा |गर्मी मिली तो उबलने लगा अधिक ठंडक मिली तो जम गया |सरकारी बयान तो हालात के अनुसार  बदलते हैं |
लेकिन मम्मियां ऐसी नहीं होती | उनके मुख से फरमाइशों के शब्दवेधी बाण निकलते हैं, जो हमेशा निशाने पर लगते हैं |पर सरकार की  बात कुछ और है |वह जो कहती है ,करती नहीं |करती है तो बताना नहीं चाहती |उसके महकमे अपने काम से काम रखते हैं |उसका एक विभाग डर्टी पिक्चर को राष्ट्रीय सम्मान से नवाजता है और दूसरा उसके टीवी पर न  दिखाए जाने का फरमान जारी करता है |यह बात किसी के गले नहीं उतर पा रही है कि डर्टी पिक्चर को मिला यह कैसा राष्ट्रीय सम्मान है जिसे लेकर अँधेरे में मुहं छिपाना पड़े |
सरकार का  कहना यह है कि ऐसी डर्टी पिक्चर को केवल रात के अँधेरे में ही देखा दिखाया जा सकता है क्योंकि ऐसे- वैसे कामों के लिए वही  समय उपयुक्त होता है |दिन में अपहरण ,डकैती ,बलात्कार ,गैगरेप,घोटाला जैसे काम हो सकते हैं | यदि दिन में डर्टी पिक्चर का  प्रसारण हुआ तो  हमारी संस्कृति ,नैतिकता  और सदाचार की झीनी चदरिया पर कालिख पुत जायेगी |सरकार अपनी उज्ज्वल छवि को लेकर अब बहुत सतर्क है |
मेरा शहर  इस  बात को लेकर कौतुहल  से लबरेज रहा  कि आखिर इस पिक्चर में है क्या ?ज़रा हम भी तो देखें कि ये डर्टी वर्टी  होता कैसा है |अधिकतर लोगों को तो यही मालूम है कि डर्टी बोले तो नटखट |चतुर ,चपल ,चंचल ,ऊर्जावान ,अतिशय मेधावी ,मृदु स्वभाव ,अल्पभाषी और शब्दों का काम  नैनों से लेने वाली| ऐसी लड़की को ही तो लोग कभी कुढ़ कर तो कभी लाड में कह दिया करते हैं –यू आर ए डर्टी गर्ल |दूसरे शब्दों में ये दो आखर का  डर्टी  भी उतना ही मासूम है ,जितना ढाई आखर का सेक्सी |आज किसी लड़की के साथ यदि सेक्सी का विशेषण जुड जाये तो समझा यही जाता है जैसे उसकी खूबसूरती में चार चंद लग गए  |
हमारी सरकार तो बात बेबात के चौंकती बहुत है |उसको  यह बीमारी अरसे से है |एक बार एक फ़िल्मी गीत आया था –चोली के पीछे क्या है |तब भी सरकार सशंकित हुई थी |उसने खूब मंथन किया था कि इस गाने का बैन करे या यूं ही सरेआम बजने दे|पर इतिहास गवाह है कि उसकी तमाम आशंकाएं कितनी निर्मूल साबित हुई थीं |और क्यों न होतीं ,जब देशभर के दूधमुहें बच्चों तक को मालूम था ,चोली के पीछे क्या है वाले दो कौड़ी के  सवाल का सही जवाब |
हमारी सरकार जनता की बुद्धिमत्ता को बहुत कम करके आंकती  आई  है |वह डर्टी का निहितार्थ बखूबी जानती है |इसीलिए तो मेरे शहर की मम्मियां जब डर्टी पिक्चर की बात उठती है तो उसे कहीं तलक भी नहीं जाने देती और मुहं में साडी का पल्लू दबाकर फिस्स से हंस भर देती हैं |उन्होंने उस दिन इस फिल्म के प्रसारण का सुबह से देर रात तक बहुत इंतज़ार किया और जब उसके दीदार न हुए तो वो छि:छि: और खीखी..खीखी करती हुई मन मार के  सो गईं |

गुरुवार, 29 मार्च 2012

ये पत्र बड़े जादुई हैं



                         एक समय वो भी था जब पत्र बड़ा कमाल करते थे |इनके जरिये एक दिल से दूसरे दिल तक प्यार की पींग पहुँच जाती थी |तब न एसएमएस था न एमएमएस ,न मोबाईल फोन ,न  इंटरनेट   और न हीं  फेसबुक |फेस टू फेस प्यार का  इज़हार संभव ही नहीं था  |लड़कियों के अभिभावक हाथ में मज़बूत डंडा और जेब में राखी लेकर चलते किसी साये की तरह उनकी निगरानी करते थे |जरा सी चूक हुई नहीं कि डंडे से पृष्ठ पूजा होती  और कलाई में लड़की के हाथों राखी बंधवा कर सद्य प्रेम का पटाक्षेप |बस एक पत्र ही थे जो अपेक्षाकृत सरल, सुलभ और कम जोखिम वाला वह उपकरण थे , जिसके माध्यम से प्रेम गीत कभी –कभी हकीकत में तब्दील हो जाते थे |उन दिनों  कुछ अतिमेधावी प्रेमी प्रेम गीत लिखने का अभ्यास करते रह गए और उनकी प्रेरणा को कोई और ले उड़ा|अभी भी अनेक घरों के पुराने संदूकों में बड़ी हिफाजत से रखे गए ऐसे प्रेम गीतों का जखीरा मिल जाया करता है ,जिन्हें पढ़ कर   लोगों की आँखे छलछला आती हैं| |
                   ये उस वक्त की बात है जब प्यार सिर्फ प्यार था |दो दिलों के धडकनों के बीच बहती पारदर्शी जल से भरी खामोश नदी का पर्याय |तब तक किसी को  प्यार के व्यापारिक मूल्य का कुछ अता पता नहीं था |धीमी रफ़्तार से चलती जिंदगी में भावनाओं की ये  खतोकिताबत रोमांचित भी करती थी और दैहिक प्यार को शब्दिक अभिव्यक्ति भी देती थी  |उस समय शायद ही कोई ऐसा रहा होगा जिसने जवानी की दहलीज़ तक पहुँचते न पहुँचते इसे महसूस न किया हो |हालंकि उस समय में भी हमारे समाज में नैतिकता के स्वयम्भू पहरूओं की कतई कमी नहीं थी जो प्यार की गंध पाते ही आदमखोर हो जाते थे |मेरे मोहल्ले की गली नम्बर पांच में रहने वाले एक युवक की  गली नम्बर दो में रहने वाली लड़की से आँखे चार हुईं तो युवक ने अपने प्रणय निवेदन को कागज पर दर्ज़ करके उसे एक ढेले पर लपेट कर लड़की की ओर आकाश मार्ग से उछाल दिया |गली नम्बर तीन में रहने वाले एक इर्ष्यालू ने उसे लपकने की पुरजोर कोशिश की पर नाकामयाब रहा पर गली नम्बर चार में रहने दिलफुंके आशिक ने कोई चूक नहीं की |फिर हुआ ये कि उस पेम पत्र के लीक होते ही ऐसी किचकिच मची कि पूरे मोहल्ले में महीनों तक युवापीढ़ी के चारित्रिक पतन पर मौखिक  निबंध लिखे जाते रहे |
                    पर अब समय बदल चुका है |अब न वो प्यार रहा न वो प्रेमी और न खत लिखने -पढ़ने वाले वैसे शूरवीर |अब तो पत्र कभी कभार ही लिखे जाते हैं |जब लिखे जाते हैं तो अक्सर वो लीक हो जाते हैं |सरकारी दरोदीवारों में आँख कान और नाक उग आये है | स्वचालित हथियारों से लैस पहरेदारों की सुरक्षा में रखे पत्र फरार होकर लेटर बम बन जाते हैं ,जिनके धमाके सरकारी ओहदेदारों को बेचैन कर देते हैं  और मीडिया को दे देते हैं जश्न मनाने का मौका |अब सरकरी तंत्र की गोपनीयता में इतने सुराख़ हैं जिनमें रखा कुछ भी बिखरने से कुछ  नहीं बचता चाहे वो कैग की रिपोर्ट हो , राजकोष ,अतिसंवेदनशील सामरिक महत्व की जानकारी या फिर सेना प्रमुख द्वारा  प्रधानमंत्री को लिखा पत्र |
                  समय चाहे कितना बदल गया हो पर पत्र तो अब भी बड़े जादुई  हैं |बिना किसी आरडीएक्स,बारूद या ईंधन के धमाके पर धमाके किये चले जा रहे हैं |
  


शुक्रवार, 9 मार्च 2012

जा बारी साईकिल फुल्ल



उसे सब गोबर के नाम से जानते हैं |दरअसल उसका नाम क्या है ,इसका पता किसी को नहीं |सड़क के किनारे लगे एक नीम के पेड़ के नीचे उसकी स्थाई दुकान है |जहाँ वह साईकिल मरम्मत का काम करता है | वह कब से यहाँ है और कहाँ से आया ,इसके बारे में भी किसी को कुछ नहीं पता |उसके अटपटे नाम के कारण यह पता लगाना मुश्किल है कि वह जन्मना   किस मजहब ,जाति ,उपजाति या प्रजाति का है |मेरे शहर में गोबर जैसे हजारों हैं ,जिनका होने का संज्ञान यह शहर कभी नहीं लेता| यही वजह है कि उसके पास न तो मतदान पहचान पत्र है और न कोई ऐसा पुख्ता सबूत कि जिससे पता चल सके कि वह इसी शहर का एक जीता जगता सांस लेता बाशिंदा है | इसके बावजूद वह इस शहर की नब्ज़ को खूब जनता है और इसकी फिजा में होने वाले मामूली से बदलाव को तुरंत भांप लेता है |वह तो जाने कब से कह रहा था –जा बारी साईकिल फुल्ल ,लेकिन सबने उसके कहे को अनसुना किया |कोई उसकी इस भविश्योक्ति  को सुनता भी कैसे ,सबके कानों में उनके पूर्वाग्रहों  के  बातून परिंदों ने  घोंसला जो बनाया हुआ था |
         गोबर पर तो मानो दीवानापन सवार था उन दिनों ,जो भी उसके पास अपनी साइकिल में हवा भरवाने आता तो वह पम्प से साइकिल की टयूब में हवा फूंकता हुआ टेर लगाये रहता ,करा लो ,करा लो हवा फुल्ल|जा बारी तो साइकिल फुल्ल |तब उसकी कही को किसी ने न सुना |सब आते अपनी साईकिल सुधरवाते ,कुछ देर नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ताते और चल देते अपने रास्ते |हर बार साईकिल में हवा भरने की मशक्कत में उसकी सांस फूल जाती तो वह फिर ढेर –सारी हवा अपने मुहँ में इस तरह  भरता मानो उसके भीतर भी कोई साइकिल का पहियां टिका है ,जिसकी हवा दुरुस्त करना ज़रूरी हो |
          एक दिन उसकी दुकान पर हाथीवाले बाबा चले आये ,परेशानहाल एक खटारा साइकिल को खींचते |आते ही साइकिल पेड़ के तने से टिकाई और वहीँ जमीन पर लगभग लेट गए |गोबर ने हाथी वाले बाबा का हाल देखा तो फिस्स से हंस दिया |पूछा –महाराज ,आपका हाथी कहाँ गया ?बाबा ने बताया कि हाथी को शहर में लाने पर पाबन्दी ही ,इसलिए जंगल में रख छोड़ा है |जब हाथी नहीं तो धंधा बंद |हम तो मर गए भूखे |खुद क्या खाएं और क्या हाथी को खिलाएं |बाबा को  गोबर ने दिलासा दिया  |उसने बाबा से कहा –बस कुछ दिन की बात और है ,सब ठीक हो जायेगा |तसल्ली रखो और लो ये बीडी में  सुट्टा लगाओ ,प्रभु के गुण गाओ|जा बारी तो साईकिल फुल्ल|उसकी इस बात पर बाबा ने अचकचा कर उसे देखा फिर अपनी साइकिल पर सवार हो कर चल पड़े |बाबा के जाते ही गोबर ठट्टा कर हंसा और टेर लगाईं –हाथी है जंगल में गुल ,जा बारी तो साइकिल फुल्ल |
          गोबर की दुकान ऐसी जगह स्थित थी जहाँ से शहर के विभिन्न स्थानों की ओर जाने वाली पांच सड़कें फूटती थीं |इसी कारण उसकी दुकान पर किस्म –किस्म के लोग आ जाते थे |कोई अपनी साइकिल में दम भरवाने के लिए रुक जाता तो कोई अपनी पंक्चर साइकिल को ठीक करवाने के लिए |रामखिलावन भी उसका स्थायी  ग्राहक है ,वह रोज सवेरे फूल से भरा टोकरा लेकर फूल मंडी जाता तो पल दो पल के लिए उसके पास रुक जाता |एक दिन आया तो बेहद परेशान |उसके चेहरे की घड़ी सुबह के सात बजे ही बारह बजा रही थी |गोबर ने उसकी ओर देखा और कुछ पूछता कि वह खुद ही शुरू हो गया |भईया गोबर ,अबकी चुनावों के समय में भी कोई फूलों का उठान  ही  नहीं है |यह सुनकर गोबर हंस कर बोला –ऐसा हो जाता कभी –कभी |फूल को जाओ भूल ,जा बारी तो साईकिल फुल्ल |रामखिलावन को उसकी बात कतई समझ में नहीं आई |वह उससे राम –राम कर आगे बढ़ लिया |
          गोबर हर आते –जाते को बात बेबात बताता रहा –जा बारी साईकिल फुल्ल |उसने तो उस मजमे वाले को  आगाह किया था जो हाथ की सफाई के ज़रिये जादू दिखाने का रोज़गार करता था |उसने तो उससे भी कहा –कोई और धंधा कर ले भाई |जा बारी तेरा  कुछ होना नाहीं |ये बात उसने हैण्ड पम्प मिस्त्री से भी कही , गुब्बारा बेचने वाले से भी,गैस सिलेंडर सप्लाई करने वाले से भी ,आइसक्रीम की रेहडी लगाने वाले से भी,राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों से लेकर स्वतंत्र टिप्पणीकारों ,चुनाव पंडितों ,अखबारनवीसों तक सबसे |पर उसकी बात किसी ने नहीं सुनी |
                 अब सब कह रहे हैं कि चुनावी नतीजे चौंकाने वाले रहे |गोबर तो  उनकी बात सुनकर हैरान है|


        

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

बरसाती मेंढकों की बड़ी डिमांड है



छठे चरण के चुनाव के लिए नामांकन भरने का काम पूरा हुआ |फूल मालाओं से लदे फदे प्रत्याशी अपने नामांकन दाखिल कर आये |नामांकन के आखिरी दिन यशोप्रार्थी अभ्यागतों को देख कर मेरे एक विद्वान मित्र ने त्वरित टिप्पणी दर्ज़ की ,लो गए सारे बरसाती मेंढक मैदान में |विद्वानों के साथ यही तो समस्या है कि एन मौके पर उनकी कल्पना शक्ति चूक जाती है और वे अतीत के अजायबघरों से ऐसे मुहावरे उठा लाते हैं ,जिनसे केवल अर्थ का अनर्थ ही नहीं होता वरन कुछ आवांतर प्रसंग भी मुखर हो उठते हैं |मसलन ये बरसाती मेंढक वाला मुहावरा आज की युवा पीढ़ी के लिए समझ से कतई  बाहर है |इस पीढ़ी ने तो किसी बरसात में यहाँ -वहाँ टर्राते मेंढ़को का कभी दीदार ही नहीं किया |रासयनिक खाद और प्रदूषण ने मेंढकों को तेज़ी से विलुप्त होती प्रजातियों की सूची  में डलवा दिया है| मेरे शहर की  किसी बरसात में इनका होना पर्यावरणविदों के लिए एक शुभ संकेत  और शोध का विषय हो सकता है| अलबत्ता मेरे शहर की खुली नालियों ,गटरों और मेनहोलों  की गंदगी में बजबजाते ऐसे कीड़ों की कोई कमी नहीं ,जिन्होंने बदलते समय के साथ प्रदूषित पानी में जीने की कला सीख ली है|मक्खी ,मच्छर और  तिलचट्टों की भी कोई कमी नहीं जो हर प्रकार की  जहरीली दवा या धुएं के खिलाफ  निर्णायक जंग जीत चुके हैं |वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को अभिव्यक्त करने लिए  मक्खी मच्छर और तिलचट्टे बरसाती मेंढक से बेहतर और अधिक सारगर्भित विकल्प  हो सकते हैं |
                      इस बार के चुनाव एकदम बेरौनक़ हैं |हमारा चुनाव आयोग जबसे पुराने समय के मिडिल स्कूल के कड़क हेडमास्टर की भूमिका में आया है,तब से सारे खुराफाती लोगों के तिकड़मी दिमागों में हरदम जलते रहने वाले बल्ब फ्यूज हो गए हैं | वे कुछ इस तरह 'कन्फूज' हो गए हैं कि उनकी समझ में ही नहीं रहा कि आचार सहिंता में कैसे और कितने छेद करें कि विजय की मंजिल सहज सुलभ हो जाये |इनको लग रहा है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो वे अन्तोगत्वा सुलभ -----के अरीब करीब विचरण करते दिखाई देंगे |आचार सहिंता का खौफ कुछ इस तरह तारी है कि केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भी विद्वानों के सामने कल्पनाशीलता का मानो आकाल पड़ गया है | कोई दरबारी कवि  चुनाव जिताऊ नारा दे पा रहा है किसी किसी दिग्गज रणनीतिकार के पास ऐसी व्यंगोक्ति है जो विपक्षियों के दिलों को बेध सके |ले -दे कर एक बेचारा मेंढक ही बचा ,जिसका इस्तेमाल लोग गाहे -बगाहे कर रहे हैं |एक ने दूसरे नेता को बरसाती मेंढक कह दिया तो तुरंत पलटवार हुआ -हाँ ,मैं बरसाती मेंढक हूँ |प्रदेश भर के पापा मम्मी  इस साफगोई पर ठीक से मुस्करा भी नही पाए थे  कि उनसे बच्चे पूछने लगे ,ये मेंढक किस देश में और किस मौसम में दिखाई देते हैं |
                       अब इन बच्चों को कौन बताये कि पहले तो  मेंढक बरसात में खूब दिख जाया करते थे ,यहाँ -वहाँ फुदकते ,टर्राते ,धमाल करते | तालाबों और पोखरों के करीब |बरसात के ठहरे हुए पानी में मटरगश्ती करते |कीट पतंगों को अपना  आहार बनाते |अब ये बायलोजी की किताब में किसी चित्र के रूप में दिखते हैं |इनकी टांगे बड़ी  लज़ीज़ होती हैं  इसलिए ये यूरोप और अमरीका के तमाम धनी मुलकों के पांच सितारा होटलों के मुख्य मैन्यू में उपलब्ध हैं |हमारा मुल्क इनका सबसे बड़ा निर्यातक है |हमने अपने बरसाती मेंढकों को विदेशियों की खाने की थाली में सजने के लिए देश बदर कर दिया है| ये बरसाती मेंढक ऐसी एक दुर्लभ   जिंस है ,जिनका मांग के अनुपात में उत्पादन बेहद कम है |ये तो साक्षात यूरो  डॉलर हैं |विदेशी बाज़ारों में जिसकी मांग होती  है ,वे तो बेशकीमती होते  हैं ,चाहे वे हमारी कमसिन लड़कियां हों ,ऊंट दौड़ में इस्तेमाल होने वाले बच्चे ,कुशल कामगार या फिर प्रतिभासम्पन्न विज्ञानी या ----या फिर बरसाती मेंढक |
                      अब समय गया है कि इन बरसाती मेंढकों को अपने मुहावरों से भी  निकाल बाहर करें |इस गरीब मुल्क को  उनकी देशज राजनीति में नहीं विदेशी मुद्रा  बाज़ार में धनार्जन के लिए बड़ी ज़रूरत है |इन मेंढकों के लिए उदास या भावुक हों |इनका निर्यात निजी और देशहित दोनों के लिए  है |ये जहाँ भी मिलें,जिस हालात में जैसे भी मिलें  ,इन्हें पकडें और निर्यात कर दें | देश के व्यापारिक सेहंत के लिए  यह ज़रूरी भी  है और अपरिहार्य भी |


निर्मल गुप्त